1
|
प्रेमचंद आज भी हमारे बीच हैं: साहित्य से समाज के आईने तक
भारतीय चेतना के पुरोधा मुंशी प्रेमचंद का साहित्य वर्तमान समय की सामाजिक चुनौतियों का भी सशक्त दस्तावेज

प्रो. सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ आचार्य, हिंदी विभाग एवं संकायाध्यक्ष, मानविकी एवं भाषा संकाय, मिज़ोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय, आइजोल
आइजोल। हिंदी साहित्य के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद केवल कहानी और उपन्यास लिखने वाले साहित्यकार नहीं थे, बल्कि वे भारतीय समाज की आत्मा को पहचानने और उसकी पीड़ा को शब्द देने वाले ऐसे रचनाकार थे, जिनकी रचनाएँ समय की सीमाओं को पार कर आज भी हमारे सामाजिक जीवन के सामने आईना बनकर खड़ी हैं। 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गाँव में जन्मे धनपत राय ‘प्रेमचंद’ के नाम से साहित्य-जगत में अमर हुए। उनके साहित्य में किसान, मजदूर, महिला, दलित, वंचित और सामान्य जन के जीवन-संघर्षों को जिस संवेदनशीलता और यथार्थ के साथ अभिव्यक्ति मिली, वह उन्हें भारतीय चेतना का विशिष्ट प्रतिनिधि बनाती है।
साहित्य को आम आदमी तक पहुँचाने वाले रचनाकार प्रेमचंद ने ऐसे समय में लेखन आरंभ किया जब देश ब्रिटिश शासन, सामंती शोषण, आर्थिक विषमता, सामाजिक रूढ़ियों, जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसी अनेक समस्याओं से जूझ रहा था। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम न मानकर सामाजिक जागरण और परिवर्तन का प्रभावी साधन बनाया।
‘नवाब राय’ नाम से उर्दू लेखन से अपनी साहित्यिक यात्रा शुरू करने वाले प्रेमचंद ने ‘सोज़-ए-वतन’ जैसी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को स्वर दिया। ब्रिटिश शासन द्वारा उनकी रचनाओं के प्रति अपनाए गए दमनात्मक रवैये ने उनके भीतर के विद्रोही साहित्यकार को और मजबूत किया। आगे चलकर उन्होंने कथा-साहित्य को राजमहलों और अभिजात वर्ग की सीमाओं से निकालकर खेतों, खलिहानों, झोपड़ियों और आम जनजीवन तक पहुँचाया।
‘गोदान’ का होरी आज भी दिखाई देता है
प्रेमचंद का यथार्थवाद उनके साहित्य की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। उनके प्रारंभिक लेखन में आदर्श और यथार्थ का समन्वय दिखाई देता है, लेकिन बाद के साहित्य में सामाजिक व्यवस्था की कठोर वास्तविकताएँ अधिक तीव्रता से सामने आती हैं। ‘गोदान’ और ‘कफ़न’ इस दृष्टि से उनकी महान रचनाएँ हैं।
‘गोदान’ का होरी केवल एक काल्पनिक पात्र नहीं है। वह भारतीय किसान के संघर्ष, ऋण, सामाजिक दबाव, आर्थिक असुरक्षा और सम्मानपूर्वक जीवन जीने की आकांक्षा का प्रतीक है। आज कृषि क्षेत्र आधुनिक तकनीक और नई नीतियों के दौर में पहुँच चुका है, लेकिन किसानों के सामने कर्ज, मौसम की अनिश्चितता, फसल संकट और आर्थिक असुरक्षा जैसी समस्याएँ अब भी मौजूद हैं। ऐसे में होरी का चरित्र हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है कि विकास की वास्तविक कसौटी क्या है—तकनीकी प्रगति या आम आदमी का सम्मानजनक जीवन?
‘कफ़न’ और संवेदनहीन होता समाज
प्रेमचंद की ‘कफ़न’ आज के उपभोक्तावादी समाज को समझने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण रचना है। कहानी के माध्यम से उन्होंने गरीबी, सामाजिक असमानता और मानवीय संवेदना के संकट को जिस गहराई से प्रस्तुत किया, वह आज भी पाठक को भीतर तक झकझोरता है। आज जब बाजारवाद और उपभोक्तावाद ने जीवन के अनेक क्षेत्रों को प्रभावित किया है, तब ‘कफ़न’ हमें यह सोचने पर विवश करती है कि आर्थिक विकास के साथ क्या हमारी मानवीय संवेदनाएँ भी उसी गति से विकसित हुई हैं? क्या हम दूसरे व्यक्ति के दुख को अपना दुख समझने की क्षमता बनाए रख पाए हैं? प्रेमचंद की यह कहानी इन प्रश्नों के सामने समाज को खड़ा करती है।
महिला सशक्तिकरण की दूरदर्शी आवाज
प्रेमचंद का साहित्य महिला जीवन की जटिलताओं और उनके अधिकारों को भी मजबूती से सामने लाता है। उन्होंने महिलाओं को केवल पीड़ित या पुरुष-निर्भर पात्रों के रूप में चित्रित नहीं किया, बल्कि उनके आत्मसम्मान, संघर्षशीलता और निर्णय क्षमता को भी महत्व दिया। आज जब महिला सशक्तिकरण, लैंगिक समानता, शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन और महिलाओं की सामाजिक भागीदारी राष्ट्रीय विमर्श के प्रमुख विषय हैं, तब प्रेमचंद की रचनाएँ इन प्रश्नों की ऐतिहासिक और मानवीय पृष्ठभूमि समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
जाति और धर्म से ऊपर मानवता
प्रेमचंद का साहित्य सामाजिक समरसता और मानवतावाद का भी साहित्य है। उन्होंने जाति, धर्म और संप्रदाय के आधार पर समाज को बाँटने वाली प्रवृत्तियों के विरुद्ध मानवीय एकता का संदेश दिया। उनके लिए मनुष्य की पहचान उसके धर्म या जाति से अधिक उसके मानवीय गुणों से होती है। आज जब समाज में विभिन्न स्तरों पर असहमतियाँ और विभाजन दिखाई देते हैं, प्रेमचंद का साहित्य हमें संवाद, सहिष्णुता, भाईचारे और मानवीय गरिमा का रास्ता दिखाता है। उनका संदेश स्पष्ट है कि किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में एकता और मनुष्यता में निहित है।
सरल भाषा, व्यापक प्रभाव
प्रेमचंद की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उनकी भाषा भी है। उन्होंने ऐसी भाषा का प्रयोग किया जो सीधे आम आदमी के जीवन से जुड़ती थी। उनकी रचनाओं में खेत, बाजार, चौपाल, घर-परिवार और सामान्य जनजीवन सहज रूप में उपस्थित होते हैं।
उन्होंने साहित्य को कठिन शब्दों और बौद्धिक प्रदर्शन की चारदीवारी से बाहर निकालकर जनता की भाषा बनाया। यही कारण है कि प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी विद्यार्थी, शिक्षक, साहित्यकार और सामान्य पाठक सभी को समान रूप से आकर्षित करती हैं।
आज के भारत में प्रेमचंद की प्रासंगिकता
प्रेमचंद को पढ़ना केवल अतीत को जानना नहीं है, बल्कि वर्तमान को समझना भी है। आर्थिक असमानता, किसान और मजदूरों की समस्याएँ, महिला अधिकार, सामाजिक भेदभाव, उपभोक्तावाद, सांप्रदायिक तनाव और मानवीय संवेदनाओं का संकट—इन सभी प्रश्नों पर प्रेमचंद का साहित्य आज भी हमें सोचने के लिए मजबूर करता है। उनका साहित्य हमें यह संदेश देता है कि समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और प्रत्येक मनुष्य को सम्मान, समानता और न्याय मिले।
प्रेमचंद का साहित्य इसलिए कालजयी है क्योंकि उसमें केवल अपने समय की समस्याएँ नहीं हैं, बल्कि मनुष्य और समाज के उन मूल प्रश्नों की पड़ताल है जो हर युग में हमारे सामने उपस्थित रहते हैं। जब तक समाज में आर्थिक असमानता, सामाजिक भेदभाव, लैंगिक असमानता और मनुष्यता के संकट मौजूद रहेंगे, तब तक प्रेमचंद की रचनाएँ हमें रास्ता दिखाती रहेंगी।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि प्रेमचंद किसी एक कालखंड के साहित्यकार नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक चेतना के अमर प्रहरी हैं। उनकी लेखनी आज भी हमें बेहतर, न्यायपूर्ण, समतामूलक और संवेदनशील समाज के निर्माण की प्रेरणा देती है। यही प्रेमचंद की सबसे बड़ी समकालीन प्रासंगिकता है।