ज्ञान और संस्कार का प्रदायक : शिक्षक
शिक्षक दिवस पर विशेष
ज्ञान और संस्कार का प्रदायक : शिक्षक
प्रो. सुशील कुमार शर्मा
कभी कहा जाता था कि शिक्षक वह दीपक है, जो खुद जलकर दूसरों को रोशनी देता है। यह बात आज भी उतनी ही सच है, लेकिन दीपक का आकार, उसकी जगह और उसके जलने का तरीका बदल गया है।
पहले शिक्षक का अर्थ था—कक्षा में खड़ा एक व्यक्ति, जो किताब से पढ़ाता था, श्यामपट्ट पर लिखता था और विद्यार्थी उसे सुनकर याद करते थे। आज शिक्षक की भूमिका इससे कहीं व्यापक हो गई है। आज का शिक्षक केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, मित्र, तकनीक का जानकार और कई बार मनोवैज्ञानिक भी है।
समय के साथ शिक्षा का स्वरूप बदला है। पहले ज्ञान के स्रोत सीमित थे और शिक्षक ही विद्यार्थियों के लिए ज्ञान का प्रमुख माध्यम था। आज मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, यूट्यूब और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने ज्ञान को लगभग हर व्यक्ति की पहुँच में ला दिया है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध है तो शिक्षक की आवश्यकता क्या है?
इसका उत्तर स्पष्ट है—शिक्षक की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, लेकिन उसकी भूमिका बदल गई है।
आज शिक्षक का कार्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि उपलब्ध जानकारी में से सही और गलत की पहचान करना सिखाना है। वह विद्यार्थियों को केवल उत्तर नहीं देता, बल्कि यह सिखाता है कि कैसे सोचना है, कैसे प्रश्न पूछना है और किसी तथ्य की सत्यता को कैसे परखा जाए। पहले शिक्षक कहता था—“मैं तुम्हें सब कुछ पढ़ाऊँगा”, जबकि आज का शिक्षक कहता है—“मैं तुम्हें सीखना सिखाऊँगा, ताकि तुम जीवनभर स्वयं सीखते रहो।”
तकनीक और शिक्षक:
इस परिवर्तन में तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका है। कोरोना महामारी के दौरान जब विद्यालय बंद हो गए थे, तब अनेक शिक्षकों ने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी। जिन शिक्षकों ने पहले कंप्यूटर का अधिक उपयोग नहीं किया था, उन्होंने जूम, गूगल मीट और ऑनलाइन माध्यमों से पढ़ाना सीखा। अपने मोबाइल से वीडियो बनाकर विद्यार्थियों तक अध्ययन सामग्री पहुँचाई।
आज स्मार्ट बोर्ड, प्रोजेक्टर और इंटरनेट कक्षा का हिस्सा बन चुके हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी शिक्षा में तकनीक के उपयोग को महत्वपूर्ण माना है। आज शिक्षक के लिए पीपीटी बनाना, वीडियो और ऑनलाइन सामग्री का उपयोग करना तथा डिजिटल माध्यमों से विद्यार्थियों को जोड़ना आवश्यक होता जा रहा है।
लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि तकनीक शिक्षक का विकल्प नहीं हो सकती। मशीन किसी प्रश्न का उत्तर दे सकती है, लेकिन विद्यार्थी के मन के भय और उसकी भावनाओं को उसी तरह नहीं समझ सकती। कंप्यूटर अंक दे सकता है, लेकिन विद्यार्थी की पीठ थपथपाकर उसे प्रोत्साहित नहीं कर सकता।
इसलिए समझदार शिक्षक तकनीक को अपना औजार बनाता है, अपना मालिक नहीं। वह तकनीक का उपयोग शिक्षण को अधिक रोचक, सरल और जीवंत बनाने के लिए करता है।
शिक्षक : मार्गदर्शक और संवेदनशील साथी:
आज शिक्षा का अर्थ केवल अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं रह गया है। अच्छे अंक के साथ अच्छा व्यवहार, स्वस्थ जीवन, भावनात्मक संतुलन और मिल-जुलकर काम करने की क्षमता भी आवश्यक है।
आज का विद्यार्थी पढ़ाई, माता-पिता की अपेक्षाओं, सोशल मीडिया और भविष्य की चिंता जैसे अनेक दबावों से गुजरता है। ऐसे में शिक्षक की भूमिका केवल अध्यापक तक सीमित नहीं रहती। वह मित्र, सलाहकार और कई बार मनोवैज्ञानिक की भूमिका भी निभाता है।
एक संवेदनशील शिक्षक यह समझने का प्रयास करता है कि कौन-सा विद्यार्थी उदास है, कौन चुप रहता है और किस विद्यार्थी को अतिरिक्त सहयोग की आवश्यकता है। वह केवल डाँटने या दंड देने के बजाय समस्या के कारण को समझने और समाधान खोजने का प्रयास करता है।
समावेशी शिक्षा में शिक्षक की भूमिका:
आज की कक्षा भी पहले जैसी एकरूप नहीं रही। प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की क्षमता, रुचि और गति अलग होती है। कोई सुनकर जल्दी सीखता है, कोई देखकर और कोई स्वयं करके।
एक ही कक्षा में अलग-अलग भाषाओं, संस्कृतियों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के विद्यार्थी होते हैं। दिव्यांग विद्यार्थी भी उसी कक्षा का हिस्सा होते हैं। ऐसे में शिक्षक की जिम्मेदारी है कि कोई भी बच्चा पीछे न छूटे।
कमजोर विद्यार्थी को अतिरिक्त समय और सहयोग देना तथा तेज सीखने वाले विद्यार्थी को नई चुनौतियाँ देना—यही समावेशी शिक्षा की भावना है। इसके लिए शिक्षक को ज्ञान के साथ-साथ धैर्य, संवेदनशीलता और समझ की भी आवश्यकता होती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति और शिक्षक:
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षक की बदलती भूमिका को विशेष महत्व दिया है। यह नीति रटने की बजाय समझने, सोचने, प्रश्न पूछने और करके सीखने पर जोर देती है।
अब शिक्षक का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है। उसे विद्यार्थियों में जिज्ञासा पैदा करनी है, परियोजनाओं के माध्यम से सीखने के अवसर देने हैं, समूह में काम करना सिखाना है और किताबी ज्ञान को वास्तविक जीवन से जोड़ना है।
इसके लिए शिक्षक को स्वयं भी लगातार सीखते रहना होगा। बदलती तकनीक और तेजी से विकसित हो रहे ज्ञान के युग में शिक्षक भी आजीवन विद्यार्थी बन गया है। नई कार्यशालाओं, ऑनलाइन पाठ्यक्रमों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से स्वयं को अद्यतन रखना आज शिक्षक की आवश्यकता है।
शिक्षक को सम्मान और सहयोग भी चाहिए:
आज शिक्षक से समाज की अपेक्षाएँ बहुत बढ़ गई हैं। समाज चाहता है कि शिक्षक बच्चों को पढ़ाए, संस्कार दे, तकनीक सिखाए, उनका मार्गदर्शन करे और उनकी भावनात्मक समस्याओं को भी समझे।
लेकिन यदि हम चाहते हैं कि शिक्षक अपनी इन बढ़ती जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभाए, तो उसे केवल अपेक्षाएँ नहीं, बल्कि सम्मान, सहयोग, अच्छा कार्य वातावरण और गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण भी देना होगा।
शिक्षक को मजबूत बनाना वास्तव में समाज के भविष्य को मजबूत बनाना है।
शिक्षक का महत्व कभी कम नहीं होगा:
वर्तमान समय में शिक्षक की भूमिका समाप्त नहीं हुई है, बल्कि पहले से अधिक गहरी और व्यापक हुई है। वह अब केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि ज्ञान तक पहुँचने का मार्ग दिखाने वाला है।
वह केवल श्यामपट्ट तक सीमित नहीं, बल्कि विद्यार्थी के मन तक पहुँचने वाला है। वह तकनीक से डरने वाला नहीं, बल्कि तकनीक का सार्थक उपयोग करने वाला है। वह केवल परीक्षा की तैयारी नहीं कराता, बल्कि जीवन की तैयारी कराता है।
पाठ्यक्रम बदलेंगे, किताबें बदलेंगी और तकनीक लगातार नई होती जाएगी, लेकिन शिक्षक का महत्व कभी कम नहीं होगा। क्योंकि मशीन जानकारी दे सकती है, लेकिन जानकारी को ज्ञान और ज्ञान को संस्कार में बदलने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है।
इसलिए जिस समाज में शिक्षक मजबूत, सशक्त और सम्मानित होगा, उस समाज का भविष्य भी उतना ही मजबूत और उज्ज्वल होगा।
वरिष्ठ आचार्य (हिंदी) एवं संकायाध्यक्ष,
मानविकी एवं भाषा संकाय,
मिज़ोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय, आइजोल




