न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

भारतीय दर्शन संस्कृति परम्पराएँ सहिष्णुता और शान्ति

भारतीय दर्शन संस्कृति परम्पराएँ सहिष्णुता और शान्ति
भारतीय समाज एवं संस्कृति की एक अनूठी विशेषता है- विविधता में एकता। इस विशेशता ने ही इसे अनन्त काल से अब तक जीवित रखा है। भारत में प्रजाति, धर्म, संस्कृति एवं भाषा की दृष्टि से अनेक विभिन्नताएं पाई जाती हैं। इन विभिन्नताओं के होते हुए भी सम्पूर्ण राष्ट्र में एकता के दर्षन होते हैं। इस सन्दर्भ में सर हर्बर्ट रिजले ने उचित ही लिखा है, ‘‘भारत में धर्म, रीति-रिवाज और भाषा तथा सामाजिक और भौतिक विभिन्नताओं के होते हुए भी जीवन की एक विषेष एकरूपता कन्या कुमारी से लेकर हिमालय तक देखी जा सकती है। वास्तव में, भारत का एक अलग चरित्र एवं व्यक्तित्व हैं, ‘‘ जो भी कारण हो, विचारों तथा जातियों के अनेक तत्वों में समन्वय, अनेकता में एकता उत्पन्न करने की भारतीयों की योग्यता एव ं तत्परता ही मानव जाति के लिए भारत की विशिष्ट देन रही है। भारत विभिन्न धर्मों की जन्मभूमि है। हिन्दू, जैन, बौद्ध एवं सिक्ख धर्मों का उदय भारत मे हुआ तथा इस्लाम और ईसाई धर्म विदेषों से यहां आए। प्रत्येक धर्म में कई मत-मतान्तर एवं सम्प्रदाय पाए जाते हैं और उनके नियमों एवं मान्यताओं में अनेक विविधताएं हैं। विभिन्न धर्मों के लोक सदियों से भारत में एक साथ रहते रहे है और धर्म न भारत में एकता पैदा की है। भारत में विभिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों के परिवारों में विवाह, रीति-रिवाजों, पहनावा आदि में विभिन्नता पाई जाती है। उसके बावजूद भी प्राचीनकाल से ही भारत की सामाजिक संरचना एवं संस्कृति में एकता के दर्शन होते है। अनेक सदियों पुरानी प्रथाएं, रीति-रिवाज रूढियां एवं परम्पराएं आज भी यहां प्रचलित हैं। सांस्कृतिक सहिष्णुता के कारण यहां अनेक बाह्य संस्कृतियों के सम्पर्क के बावजूद भी भारतीय संस्कृति का स्वरूप अक्षुण्ण बना रहा। वर्तमान समय में भी विभिन्न, धर्म, जाति, क्षेत्र एवं भाषा समूहों के बावजूद भी यहाँ एकता के भाव विद्यमान हैं। भारतीय संस्कृति की महान् विशेशता इसकी सहिष्णुता है। भारत में सभी धर्मों, जातियों, प्रजातियों एवं सम्प्रदायों के प्रति उदारता, सहिष्णुता एवं प्रेम-भाव पाया जाता है। भारतीय संस्कृति की उदार एवं सहिष्णु प्रकृति के कारण ही इसमें विभिन्न संस्कृतियो ं का समन्वय हो पाया है। हमारी संस्कृति समस्त मानवीय गुणों की एक लहलहाती फसल है तथा सद्भाव, सहिष्णुता, त्याग, बलिदान, आत्मीयता सर्वधर्मसमभाव एवं विश्वबन्धुत्व के उदार गुणों ने इसे सदा-सर्वदा खींचने का कार्य किया है। संकीर्ण विचारधाराओं से ऊपर उठकर सम्पूर्ण विष्व के कल्याण के लिए चिन्तन करना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। इसलिए कहा गया है
‘‘ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत्।।’’
शान्ति, प्रगति के लिए अव्यंत आवश्यक है। यह बात वैश्विक प्रगति पर लागू होती है। विश्वशांति से ही वैश्विक प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है, वैश्विक समुदाय द्वारा इस बात को अरसे से महसूस किया जाता रहा है। एक सुदर विकासोन्मुखी एवं वास्तव में सुसभ्य व मानवीय गुणों से परिपूर्ण समाज के निर्माण की पहली षर्त विश्वशांति है? शान्ति, से सृजन होता है और अषांति से विध्वंश। विध्वंश से मानवता कराहती है, जबकि सृजन से इसका रूप निखरता है। यही कारण है कि विश्वषांति को एक बेहतर दुनिया बनाने के आदर्ष के रूप में देखा जाता है। मानव अपने भौतिक तथा सामाजिक वातावरण के साथ अपने समायोजन की प्रक्रिया में तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करता है तथा अपने इन विभिन्न प्रकार के अनुभवो ं के आधार पर जीवन के कुछ सामान्य सिद्धान्त विकसित करता है। व्यक्ति द्वारा अपने लिए निर्धारित जीवन के इन सामान्य सिद्धान्तों को ही मूल्यों के नाम से पुकारा जाता है। मूल्य वास्तव में मानव के व्यक्तित्व का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पक्ष प्रतिबिम्बित करते है। जब हम शिक्षा की बात करते है तो सामान्य अर्थों में यह समझा जाता है कि इसमें हमें वस्तुगत ज्ञान प्राप्त होता है तथा जिसके बल पर हमें कोई रोजगार प्राप्त कर सकते है। वस्तुपरक शिक्षा हर क्षेत्र में उपयोगी है। परन्तु जीवन में केवल पदार्थ ही महत्वपूर्ण नहीं है। पदार्थों का अध्ययन आवश्यक है, राष्ट्र की भौतिक दषा सुधारने के लिए, जीवन मूल्यों का उपयोग हम राष्ट्र की उन्नति के लिए कर सकते हैं। शान्ति, शिक्षा प्यार, सत्य, न्याय, समानता, सहनशीलता, सौहार्द, विनम्रता , एकजुटता और आत्म संयम इन सारे मूल्यों को व्यवहार में लाने पर बल देती है। शान्ति, शिक्षा के आधार के रूप में धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा जहाँ एक ओर धर्म के विषय में उसकी बुनियाद और उनमें अन्र्तनिहित मूल्यों के विषय में जानने तथा सही समझ के लिए प्रेरित करती है, वहीं दूसरी ओर नैतिक शिक्षा मानव के आचार विचार व्यवहार को सकारात्मक दिरूाा में ले जाने में सहयोग देती है। व्यक्तियों में ऐसे मूल्यों, कौषलों, अभिवृत्तियों का समावेश करे जिससे उन्हें दूसरों के साथ सौहृार्दपूर्ण व्यवहार रखने वाले एवं उत्तरदायी नागरिक बनने में मदद मिले। ऐतिहासिक दृष्टि से नैतिक शिक्षा एवं मूल्य शिक्षा शान्ति, शिक्षा के लिए पूर्वज है या दूसरे शब्दों में हम कह सकते है कि ये शान्ति, शिक्षा के लिए आधार है। शान्ति, शिक्षा मूल्यों के उद्देश्यों को ठोस रूप देती है और उनके आंतरीकरण को प्रेरित करती है। शान्ति, के लिए शिक्षा को ऐसे ज्ञान, कौशल, मूल्यों एवं अभिरुचि का पोषण करना होता है जिससे शान्ति, की संस्कृति निर्मित होती है। अंहिसक तरीके से द्वन्द्वों का समाधान करने वाले अमनपसंद लोग तैयार करना इसकी एक दीर्घकालिक उद्देश्य/रणनीति है। शान्ति, शिक्षा समग्रतामूलक है। मानवीय मूल्यों के एक ढांचे के भीतर बच्चों का भौतिक, भावनात्मक, बौद्धिक और सामाजिक विकास इसके दायरे/परिधि में आता है। संक्षेप में शान्ति, शिक्षा के समग्र रूप के दो निहितार्थ है-
लोगों को हिंसा का मार्ग चुनने के बजाय शान्ति, का मार्ग चुनने में सशक्त बनाना।
उन्हें शान्ति, का उपभोक्ता बनने के बजाय उसका सर्जक बनाना।
संस्कृति शब्द का सम्बन्ध मानवता से है हम जिस संस्कृति का स्मरण करते हैं उस संस्कृति का परिचय वेद, उपनिषद, वेदांग, पुराण धार्मिक साहित्य, स्मृतियों से प्राप्त होता है। संस्कृति मानव समुदाय की आत्मा है संस्कृत और संस्कृति का आधार आधेय सम्बन्ध है शास्त्रकारों ने भी कहा है-
या संस्कृतिः संस्कृतं भारती च, भवन्तमाश्रित्य विवर्धमाने
तत्वो वियुङक्तकथमेश्यतस्ते क्षेमं पुनःसम्प्रति नैव ज्ञाने
भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत जीवन दर्षन का मूलाधार ही मूल्य है अर्थात् भारत का पौराणिक दर्षन मूल्य दर्षन हैं। ऋतं, सत्यं, आनन्दतत्व, पुरूषार्थ की कल्पना, वर्णाश्रम व्यवस्था, आदि के माध्यम से जीवन मूल्यों की अवधारणा अभिव्यक्त हुई है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि समय और आवष्यकतानुसार मूल्य सदा परिवर्तनशील है। मूल्य बदलने से जीवन पद्धति बदल जाती है और जीवन पद्धति बदलने से मूल्य भी बदल जाते है। वर्तमान में हमारा देष लोकतंत्रीय मूल्यों का पोषक है। स्वतन्त्रता समानता, भ्रातृत्व, न्याय, समाजवाद और पंथ निरपेक्षता उसका प्राण है किन्तु अमानवीयता अलगाववाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद आदि विघटनकारी षक्तियाँ हमारे लोकतंत्र को कमजोर कर रही है। अतः आवष्यक है कि विश्वबन्धुत्व तथा वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे प्राचीन जीवन मूल्यों व लोकतंत्रीय मूल्यों व आदर्षों से अपने मानव जीवन को चरितार्थ करें। भारतीय संस्कृति परम्परा आचरण और व्यवहार का प्रतिविम्बात्मक स्वरूप है।संस्कृति का बोध शिष्टाचार सद्व्यवहार से होता है मनुस्मृति में कहा गया है-

अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः
चत्वारी तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम्
‘‘अगर हम विश्व को वास्तविक शान्ति, का पाठ पढाना चाहते हैं, तो हमें शुरूआत बच्चों से करनी होगी।’’- महात्मा गाँधी जी
भारतीय दर्शन संस्कृति परम्परा में विश्व कल्याण की भावना गंूजती है। सभी जीवों पर दया भाव रखना कल्याण्कारी मार्गों का आश्रय लेकर सर्व कल्याण की भावना सहिष्णुता के भाव रखना परम लक्ष्य है। भारतीय दर्शन विश्व दर्शन है, वास्तविक विचार दर्शन है। ग्रहणशीलता, कर्म धर्म को स्वीकार करने वाला,व्यावहारिकता आत्मबोध, सर्वदुःख निवारण, सर्वकल्याण की भावना रखने वाली संस्कृति यत्र विश्वं भवत्येक नीडम् की भावना का विकास करती है।विश्व शान्ति की कामना करती है-
द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोाधयः शान्तिः
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः।
डाॅ अनूप बलूनी

Associate Professor

Faculty of Education

Motherhood University Roorkee

 Uttrakhand

Last Updated on February 12, 2021 by anupbaluni

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