न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

मोहन राकेश के नाटकों में अभिनेयता

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शोध सार :

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी नाट्य साहित्य में मोहन राकेश का नाम उल्लेखनीय है। राकेश के नाटकों ने केवल नाटक का आस्वाद, तेवर और स्तर ही नहीं बदल दिया बल्कि हिंदी रंगमंच को एक नई दिशा प्रदान की है। हिंदी नाटक को कथ्य एवं शिल्प के स्तर पर समृद्ध किया है। तत्कालीन समय के जगदीश चन्द्र माथुर, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश आदि के कारण नाट्य लेखन में और मंचन के स्तर पर नई चेतना, दिशा, दर्शक के रूप में योगदान रहा हैं। इन नाटककारों के कारण नाट्य साहित्य को एक नया मोड़ दिया। मोहन राकेश ने नाटकों में ‘रंगमंच संप्रेषण’ का पूरा ध्यान रखा है। नाट्य लेखन में राकेश ने नए-नए प्रयोग किए है। जैसे- दृश्यबंध, अभिनेयता, ध्वनियोजना, प्रकाश योजना, गीत योजना, रंग-निर्देश के साथ-साथ भाषा के स्तर पर परिवर्तन के कारण नाटक को सजीव रूप मिला है। इसी कारण नाटकों में अभिनेयता अधिक रूप में फली फुली है। राकेश ने उपन्यास, कहानी संग्रह, नाटक, निबंध, एकांकी आदि विधाओं में कलम चलाई है। लेकिन नाट्य साहित्य में जो प्रसिद्धि मिली शायद किसी नाटककारों को मिली होगी। इसमें ‘आषाढ़ का एक दिन’ (1958), ‘लहरों के राजहंस’ (1963) और ‘आधे अधूरे’ (1969) में अभिनेयता को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।

बीज शब्द  : नाटक, मंच परिकल्पना, प्रकाश व्यवस्था, आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्विक, मूक अभिनय, पारिवारिक कडुवाहट, वेशभूषा, अश्रु, अंक आदि।

मोहन राकेश बहुमुखी प्रतिभा संपन्नवाले नाटककार रहे है। मोहन राकेश ने हिंदी नाट्य संसार में उल्लेखनीय काम किया है। राकेश ने अभिनय, निर्देशन, मंच-परिकल्पना, प्रकाश व्यवस्था, कथ्य एवं शिल्प के स्तर पर प्रयोगशील काम किया है। उनके नाट्य विषय में नवीनता रही है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक में कालिदास और मल्लिका का प्रेम संबंध कालिदास की प्रतिभा से प्रभावित होकर उज्जयिनी के नरेश द्वारा बुलावा भेजना, कालिदास को उज्जयिनी जाने के लिए मल्लिका का प्रेरित करना, कालिदास का उज्जयिनी गमन, प्रियंगुमंजरी से परिणय, मल्लिका के ग्राम-प्रांतर में कालिदास का आना, कश्मीर का उपद्रव, घायल कालिदास की प्रत्यावर्तन, मल्लिका के जीवन से कालिदास की वितृष्णा आदि घटनाओं के सहारे नाटक की कथावस्तु विकसित हुई है। ‘लहरों के राजहंस’ नाटक में नन्द के माध्यम से आधुनिक मनुष्य की दुर्बलता और मानसिक संघर्ष का चित्रण किया है। मूलतः नन्द प्रवृत्ति और निवृत्ति, भोग और योग के बीच पीसता रहता है। नन्द और सुन्दरी परस्पर आलिंगन बद्ध होकर एक संशय से इतने दूर जा गिरते हैं कि उनका मिलना असंभव होता है। वर्तमान समय में टूटते बिखरते परिवारों के मूल में इसी विचार-वैषम्य की भूमिका लक्षित की जा सकती है। प्रस्तुत नाटक में नन्द और सुन्दरी के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों का द्वन्द्व प्रस्तुत करने में नाटककार सक्षम रहे हैं। ‘आधे अधूरे’ नाटक में स्त्री-पुरुष के बीच तनाव, पारिवारिक विघटन की गाथा, मध्यवर्गीय परिवार की समस्या, मनुष्य का अधूरापन, सावित्री का संपूर्ण पूर्ण मनुष्य खोजने का प्रयास, असंतोष आदि पहलू को रंगमंच पर उजागर करने में नाटक सक्षम रहा है। राकेश के नाटक प्रयोगशील रहे है। पात्रों का स्वाभाविक चित्रण, संवादों में मार्मिकता, बोलचाल की भाषा, अभिनेयता, देशकाल वातावरण और रंगमंचीयता की दृष्टि से सफल है।

नाटक में अभिनय वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से अभिनेता या पात्र अभ्यास और अभिनय के बल पर एक विशिष्ट चरित्र दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। नाट्य प्रयोग में अभिनय ही प्राणतत्व होता है। नाटक के सभी भाव, विचारों, आनन्द, घृणा और संवादों को रूपायित करने का साधन अभिनय है। भरतमुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ में अभिनय का विचार-विमर्श बड़े विस्तृत मात्रा में किया है। ‘अभिनय’ शब्द के उत्पत्ति के बारे में लिखते हैं- ‘‘णी´ धातु से ‘अभि’ उपसर्ग लगाने से ‘अभिनय’ शब्द बनता है जिसका अर्थ है- नाटक के प्रयोग द्वारा मुख्यार्थ (कथानक) को श्रोता या सहृदय सामाजिक के हृदय तक पहुँचाना और विभावन या रसास्वादन कराना है।’’1 अतः अभिनय से तात्पर्य है- उस व्यापार से है जो हमें अपने चारों ओर के संसार से निकालकर, रंगमंच पर निर्मित हो रहे कलात्मक संसार में पहुँचा देता है। अभिनेता अपने अभिनय से सहृदय के हृद्य में सौंदर्य का उद्बोधन करता है। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में लिखा है- ‘‘आड़िको वाचिकश्चैव हृहार्य: सात्विकस्तिथा। ज्ञेयस्त्वभिनयो विप्राश्चतुर्धा परिकीर्तिता।’’2 अर्थात भरतमुनि ने नाट्य अभिनय चार प्रकार के माने हैं। जैसे- आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक भेदों का उल्लेख किया है। आंगिक अभिनय से हाथों, ऊँगलियों, नेत्रों, पाँवों और नासिका के चेष्टाओं से अभिव्यक्त होता है। वाचिक अभिनय से कथोपकथन, गीत, धुनों, स्वरों, शब्द उच्चारण के आरोह-आवरोह द्वारा भिन्न-भिन्न भावों का स्पष्टीकरण होता है। आहार्य अभिनय से ही स्पष्ट है कि इसमें अभिनेता में वेशभूषा और श्रृंगार प्रसाधन महत्वपूर्ण होता है। सात्विक अभिनय में अभिनेता की समस्त मानसिक और आत्मिक शक्तियों का प्रयोग किया जाता है। पश्चिम में अभिनय के लिए ‘ऐक्टिंग’ संज्ञा का प्रयोग किया जाता है। यह मूल शब्द ‘ऐक्ट’ है। हम जीवन में संसार में जो कुछ करते रहते हैं वह अभिनय ही है। एक मनुष्य लगभग इन्हीं अभिनयों से गुजरना होता है। जैसे- कभी पुत्र, कभी शिष्य, कभी पति, कभी पिता तो कभी दादा या नाना, तो कभी अध्यापक, कभी अधिकारी के भूमिका में उसे जाना पड़ता है। वर्तमान समय के नाटकों में अभिनय कौशल बदल रहे है। मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’ और ‘आधे अधूरे’ नाटकों में आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक अभिनय के साथ-साथ मूक अभिनय का भी प्रयोग मिलता है।

आंगिक अभिनय :

आंगिक अभिनय से तात्पर्य है- शरीर के अंगों, उपांगों और प्रत्यंगों की विभिन्न चेष्टाओं के भंगिमाओं से हैं। सरल वाक्य में कहें तो अंगों द्वारा निष्पन्न होने वाला अभिनय को आंगिक अभिनय कहा जाता है। भरतमुनि ने आंगिक अभिनय के तीन प्रकार स्पष्ट किए है- शरीर, मुखज और चेष्टागत। इसके अंग और उपागों के प्रकार आ. विश्वनाथ मिश्र ने किताब में लिखते हैं- ‘‘मानव शरीर के छह अंग स्वीकार किए गए है। जैसे- सिर, आँख, वक्ष, पार्श्व, कटि एवं पाद। इसी प्रकार उपांग भी छह माने गये हैं, यथा- नेत्र, ध्रुव, नासा, अधर, कपोल और चिबुक। आँखों के फिर तीन प्रत्यंग माने गये हैं- तारा अर्थात पुतलियाँ, पुट अर्थात् पलकें और भ्रकुटि। ये सभी अंग-प्रत्यंग अपनी विभिन्न भंगिमाओं, मुद्राओं एवं चेष्टओं द्वारा विभिन्न प्रकार के अुनभवों को अभिव्यक्त करते हैं।’’3 इस कथन से स्पष्ट है कि आधुनिक नाटकों में छह अंगों का प्रयोग मिलता है। आंगिक अभिनय में प्रथम शिरो भाग की चेष्टाओं पर विचार विमर्श किया गया है। इस संसार में जीवन-प्रवाह में बदलती परिस्थितियों को हमारी आँखें, कपोल, नासिका आदि विशेष रंग, दृष्टि ग्रहण करते हैं। भरतमुनि ने इसे ‘मुखराग’ कहा गया है। मुखराग के चार प्रकार है- स्वाभाविक, प्रसन्न, रक्त और श्याम। इसमें सामान्य अवस्था में हमारा मुख स्वाभाविक रहता है। किसी से बहुत अनुराग की भावना है, मन की प्रसन्नता व्यक्त होती है तो उसे प्रसन्न अवस्था होती है। रक्त अर्थात इसमें वीर, रौद्र और भय की अभिव्यंजना में मुख बहुत लाल हो जाता है तो उसे रक्त नाम से अभिहित किया गया है। करुणा, बीभत्सता और भय की अनुभूतियों को लेकर श्यामता का जन्म होता है। आंगिक अभिनय में हाथों के बाद वक्षस्थल, आभुग्न, निर्भुग्न, प्रकंपित, उद्वाहित और सम अवस्थाएँ ग्रहण करता है।

मोहन राकेश के नाटकों में आंगिक अभिनय प्रखर रूप में दिखाई देता है। राकेश के ‘लहरों के राजहसं’ नाटक का आधार ऐतिहासिक है। कपिलवस्तु की राजकुमार नन्द की पत्नी सुन्दरी वर्षों के बाद कामोत्सव का उत्सव मनाना चाहती है। प्रधान कर्मचारी श्वेतांग, कर्मचारियों में नागदास, शेफालिका, नीहारिक, मंदारक, बीजगुप्त आदि सभी कार्यों के प्रति जुड़े है। प्रथम अंक में जब सुन्दरी ने कामोत्सव का आयोजन किया था उसमें सिर्फ आर्य मैत्रेय ही अतिथि आए है। रविदत्त, अग्निवर्मा, नीलवर्मा, ईशाण, शैवाल, पद्मकांत, रूद्रदेव, लोहिताक्ष, शालिमित्र आदि ने कामोत्सव में आने के लिए असमर्थता दर्शायी है। जब सुन्दरी ने श्यामांग को साधारण गलती की सजा़ सुनाती है। वह बात नन्द को पसंद नहीं होती। क्योंकि जिस प्रकार कालिदास की प्रेरणा स्रोत मल्लिका है तो नन्द के अन्तर्मन की प्रतिछवि श्यामांग है। डॉ. राजेश्वरप्रसाद सिंह के ‘मोहन राकेश का नाट्य-शिल्प: प्रेरणा एवं स्रोत’ पुस्तक से उद्धृत हैं- ‘‘श्यामांग को सुन्दरी हमेशा अनुदार दृष्टि से देखती है। आत्मकेन्द्रित सुन्दरी से हटकर नन्द जब भी किसी से जुटता है, सुन्दरी को उसके प्रति चिढ़ हो जाती है। जिस तरह उसकी चिढ़ यशोधरा और बु़द्ध के प्रति है, उसी तरह श्यामांग के प्रति भी है। वह स्पष्टत: कहती हैः ‘वह एक व्यक्ति नहीं, दो आँखों का एक अनचाहा भाव है, जो हर समय इस घर की हवा में घुला-मिला है।’ ‘आषाढ़ का एक दिन’ में मल्लिका भी विलोम को ‘अनचाहे’ ‘अतिथि’ के रूप में देखती है। भीतरी चिढ़ का ही परिणाम है कि एक साधारण-सी गलती पर सुन्दरी श्यामांग को ‘अन्धकूप’ में डाल देने की सजा दे देती है।’’4 इससे तात्पर्य इतना ही है कि सुन्दरी जानती है कि श्यामांग को सजा सुनाई तो अधिक चोट नन्द के हृद्य को होनेवाली है। क्योंकि नन्द का श्यामांग के प्रति विशेष अनुराग है। लेकिन नन्द सफाई देता है कि जहाँ तक मैं जानता हूँ कि श्यामांग… और बात काट लेता है। इसी समय नाटककार ने मुखज, और आधार देने के लिए उसके कंधे पर हाथ रखता है। इससे तात्पर्य है कि सुन्दरी को अब गुस्सा आया है यह नन्द जानता है और उसे चुप-चाप देखता है और उसके कंधे पर हाथ रखता है। उसका चेहरा स्वयं के हाथ में लेता है। लेकिन सुन्दरी का चेहारा लाल हो गया है। अब वह नन्द को हाथ भी हटा देती है। सुन्दरी को ऐसा लगता है कि कामोत्सव में नन्द की साथ चाहिए लेकिन उसे वह नहीं मिलती। यहाँ पर नाटक में उक्त अभिनय आंगिक के मुखज अभिनय के अंतर्गत आता है।

राकेश के ‘आधे अधूरे’ नाटक में आधुनिक जीवन की पारिवारिक कडुवाहट और अधूरेपन को चित्रित किया है। डॉ. बच्चन सिंह ने ‘हिंदी नाटक’ किताब में ‘लहरों के राजहंस’ नाटक के अंतिम प्रसंगों से ‘आधे अधूरे’ नाटक को समझते हैं- ‘‘नन्द अनेक बिन्दुओं को खोजने पर भी अपने ही बिन्दु पर रहता है। क्या वही स्थिति इस काले सूटवाले आदमी की नहीं है ? इसकी स्थिति तो और भी बदतर है। नन्द तो बिन्दुओं की खोज भी करता है, किंतु काले सूटवाला आदमी तो यह भी छोड चुका है। यह ट्रेजिडी, अकेलापन इसकी आधुनिकता है।’’5 इस कथन से स्पष्ट है कि परिवार का विघटन, आर्थिक दबाव से व्यक्ति की तड़प-झड़प का नाटक में देखने को मिलती है। इस नाटक में आंगिक अभिनय में छह प्रकार में से आँखों से अभिनय का एक प्रमुख अंग है। इस नाटक में अशोक और छोटी लडकी (किन्नी) हमेशा लड़ते झगडे हैं। मूलतः मनोविज्ञान कहता है कि बच्चों के व्यक्तित्व पर परिवार या माता-पिता के संस्कार का प्रभाव पड़ता है। वह अपनी छोटी बहन को पड़ोसी की लड़की से सेक्स संबंधित बातें करते हुए सुनता और आग बबूला हो जाता है। जब अशोक अश्लील पुस्तकें पढ़ता है और भेद खुलने पर छोटी बहन को मारता है तब मंच पर आंगिक अभिनय अधिक मात्रा में सक्रिय हो जाता है। यथा-

‘‘पुरुष एक     : (लड़की के पास पहुँचकर) कौन-सी किताब ?

लड़का       : यह किताब।

छोटी लड़की   : झूठ, बिलकुल झूठ। मैंने देखी भी नहीं यह किताब।

लड़का        : (आँखे फाड़कर उसे देखता) नहीं देखी ?

छोटी लड़की   : (कमज़ोर पड़कर ढीठपन के साथ) तू तकिए के नीचे रखकर सोए,

              तो भी कुछ नहीं। मैंने ज़रा निकालकर देख-भर ली, तो…

पुरुष एक     : (हाथ बढ़ाकर) मैं देख सकता हूँ ?

लड़का        : (किताब वापस बुश्शर्ट में रखता) नहीं… आपके देखने की नहीं है।

              (स्त्री से) अब फिर पूछो मुझसे कि इसकी उम्र कितने साल है ?

बड़ी लड़की    : क्यों अशोक… यह वही किताब है न कैसानोवा… ?

पुरुष एक     : (ऊँचे स्वर में) ठहरो पहले मैं यह जान सकता हूँ यहाँ किसी से

              कि मेरी उम्र कितने साल की है ?’’6

इस उदाहरण से स्पष्ट है कि अशोक भले ही उम्र से छोटा है लेकिन वह अश्लील पुस्तकें पढ़ता है और भेद खुलने पर छोटी बहन को मारता है। इसमें जब उसक भेद खुलने वाला है तो वह किन्नी की तरफ बडे़-बडे़ आँखे कर देखता है। उस नज़र में यही बात होती है कि फिर मैं देखूगा। नाटक में आंगिक अभिनय में अधिक मात्रा में आँख, हाथ, सिर आदि अभिनय का प्रयोग अधिक मात्रा में हुआ है।

वाचिक अभिनय :

किसी भी नाटक में शब्द, उच्चारण, वार्तालाप का ढ़ंग या शैली, स्वर और ताल से ही नाटक का संवाद दर्शकों के स्मृति में रहता है। श्रृंगार और हास्य रस के माध्यम से षड्ज के स्वरों को निर्मिती होती है। तो वीर रस पंचम स्वरों से अभिप्रेत होता है। प्राचीन नाटकों में और आधुनिक नाटकों में मंचीयता को और सजीवता लाने के लिए वाद्य-संगीत अभिन्न अंग होता है। किसी नाटक में अगर संगीत या वाद्य का प्रयोग नहीं होता है तो दर्शक गण उब जाएंगे। रंगमंच पर जो भाव धारा को व्यक्त करना है उसकी शब्दावली का ध्वन्यात्मक विन्यास उस अभिनय के अनुरूप होनी चाहिए। भरतमुनि ने दस काव्य गुण माने हैं- श्लेष, समाधि, माधुर्य, ओज, प्रसाद, सौकुमार्य, समता, अर्थव्यक्ति, उदारता और कान्ति। इसी गुणों के अवतारणा से वाणी के वर्चस्व का और भी अभिवर्धन हो जाता है। वाचिक अभिनय में पात्रों के बोलने के ढंग पर विचार-विमर्श किया है। बोलने के सात उपकरण माने जाते हैं- ‘’सात स्वर, तीन स्थान, चार वर्ण, छह अलंकार, दो काकु और छह अंग।’’7 अतः इन उपकरण से नाटक में संवाद अधिक मर्मस्पर्शी हो जाते है।

नाटककार ने नाटकों में वाचिक अभिनय का प्रयोग किया है। जिससे उनकी अभिनेयता झलकती है। मोहन राकेश के नाटकों में हर एक पात्र की शिक्षा, प्रसंग के अनुरूप भाषा का प्रयोग करते हैं। राकेष का ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक ऐतिहासिकता के संबंधित होने के कारण उसकी शब्दावली कुम्भ, धारासार, तल्प, अंशुक, र्भत्सना, सामुद्रिक, पार्वत्य भूमि, विलोम, उपादन आदि शब्द  संस्कृतनिष्ठ है। तो नाटक के पात्र के अनुरूप उनकी वार्तालाप का ढ़ंग परिवर्तन होता है। इस नाटक के तीसरे अंक में जब कालिदास कश्मीर की राजपद छोड़कर मल्लिका को मिलने के लिए आता है। तो उसके मुख से कोई बहुत बड़ा पराक्रम करने वाली वाणी नहीं थी। उसके विलोम के शुरुआत के दिनों के जिस प्रकार से बात करता था वह स्वर भी नहीं था। जब कालिदास ने मल्लिका के सामने उपस्थित होता है तब उसके स्वर में पश्चाताप भरे शब्द थे। कालिदास को कवि के रूप में जीवन-यापन करना है न की एक शासक के रूप में। इन दोनों रूप में उसका जीवन रहा है तब भी अभिनय में अंतर है। कालिदास ने मल्लिका के सामने आता है उसे हर्ष होता है लेकिन मल्लिका से बातें पहले जैसी नहीं होती। क्योंकि समय किसी का गुलाम नहीं होता। समय के साथ मनुष्य बदल जाते हैं। यथा- 

‘‘कालिदास    : बहुत दिन इधर-उधर भटकने के बाद यहाँ आया हूँ। कश्मीर जाते हुए जिस कारण से

               नहीं आया था, आज उसी कारण से आया हूँ।

मल्लिका      : आर्य मातुल से आज ही पता चला था कि तुमने कश्मीर छोड़ दिया है।

कालिदास     : हाँ, क्योंकि सत्ता और प्रभुता का मोह छूट गया है। आज मैं उस सबसे मुक्त हूँ जो वर्षों से मुझे कसता रहा है। कश्मीर में लोग समझते हैं कि मैंने संन्यास ले लिया है। परन्तु मैंने संन्यास नहीं लिया। मैं केवल मातृगुप्त के कलेवर से मुक्त हुआ हूँ जिससे पुनः कालिदास के कलेवर में जी सकूँ। एक आकर्षण सदा मुझे उस सूत्र की ओर खींचता था जिसे तोड़कर मैं यहाँ से गया था। यहाँ की एक-एक वस्तु में जो आत्मीयता थी, वह यहाँ से जाकर मुझे कहीं नहीं मिली। मुझे यहाँ की एक-एक वस्तु के रूप और आकार का स्मरण है। (फिर प्रकोष्ठ में आसपास देखता है।) कुम्भ, बाघ-छाल, कुशा, दीपक, गेरू की आकृतियाँ… और तुम्हारी आँखें। जाने के दिन तुम्हारी आँखों का जो रूप देखा था, वह आज तक मेरी स्मृति में अंकित है। मैं आपने को विश्वास दिलाता रहा हूँ कि कभी भी लौटकर आऊँ, यहाँ सक कुछ वैसा ही होगा।’’8

उक्त कथन से स्पष्ट होता है कि कश्मीर के कार्यकलाप से उब गए है। अब उन्हें शासक नहीं रहना। वह आम जीवन बिताने चाहते हैं वह पुनः मल्लिका के साथ समय गुजरना चाहते है। लेकिन समय के साथ सभी चीजें बदल गई है। इसलिए प्रकोष्ठ में तीक्ष्ण नज़र से देखता है। यहाँ पर उसके संवाद में प्रसाद (मानसिक शांति, हर्ष) गुण भरा है।

राकेश के ‘लहरों के राजहंस’ नाटक में वाचिक अभिनय में ओज, प्रसाद, माधुर्य कुट-कुट के भरा है। सुन्दरी कपिलवस्तु की राजवधु है। उसमें राजसी दर्प अधिक ही भरा है। नाटक के तृतीय अंक में नन्द के केश काट दिए है। सुन्दरी के माथे पर नन्द के विशेषक गीला करने का प्रयास करता है लेकिन सुन्दरी हड़बड़कर उठ जाती है। यहां पर का संवाद वाचिक अभिनय का उत्तम उदाहरण है।

आहार्य अभिनय :

संस्कृत काल से वर्तमान काल तक वेश-भूषा को ध्यान में रखकर नाटक लिखा जाता है। नाटक के पात्रों की वेश-भूषा कैसे हो वह पात्र के स्थिति या उसका किस प्रकार अभिनय है इस पर संबंधित होता है। किसी अभिनेता की नाटक में क्या भूमिका है उस पर उसकी वेश-भूषा निर्भर होती है। वेश-भूषा के संबंध में बलवंत गार्गी लिखते हैं- ‘‘वेश-भूषा और श्रृंगार प्रसाधन में रंगों, मुकुटों, आभूषणों, अलंकारों का बहुत सूक्ष्मता से ध्यान रखा जाता है। देवताओं या अप्सराओं के मुख चंदन के रंग के होते हैं। वेश-भूषा के विशेषज्ञ को किसी विश्वकोश रचयिता की भाँति पात्रों की श्रेणियों, जातियों, स्वभाव, पदवी और काल तथा स्थान का पूरा-पूरा ज्ञान अपेक्षित होना चाहिए। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के मुख और वर्ण और शूद्रों के श्यामवर्ण होते हैं। भिक्षुओं का चेहरा सफाचट, राजाओं और सभासदों की दाढ़ी-मूँछ तराशी हुई और तपस्वी और अघोरी जटा जूट धारी होते हैं।’’9 आहार्य से तात्पर्य है कि कृत्रिम, नैमिन्निक, साभिप्राय और श्रृंगार या आभूषण से संप्रेषित होता है। अभिनय में अभिनेता जो मूल ‘स्वभाव’ को छोड़कर ‘परभाव’ को ग्रहण करता है वह आहार्य में ही संपन्न होती है। आहार्य अभिनय में स्वयं को दूसरे रूप में ढालना बड़ा जोखिम का कार्य है। इस आहार्य से तात्पर्य है कि अभिनेता या अन्य पात्रों को जिस प्रकार का अभिनय है तो उसे उस वेश-भूषा को ढालना होता है। तभी दर्शकों पर उसका अधिक मात्रा में प्रभाव होता है।

नाटककार ने नाटकों में आहार्य अभिनेयता के कारण नाटक के चरित्र बरसों बाद भी याद में रहते हैं। आहार्य अभिनेयता के अंतर्गत पात्रों की वेश-भूषा, अभूषणों, वस्त्रों आदि रूपसज्जा का उल्लेख मिलता है। शरीर के विविध रंगों से सजाने की पद्धतियाँ इसी में रहती है। नाटक में पात्रों की योग्य वेश-भूषा से दर्शकों के हृदय में घर कर जाते हैं। उसका अतिरेक या ठीक से वेश-भूषा नहीं बनी तो हँसी मजाक का कारण भी बन जाता है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक में मल्लिका, कालिदास, विलोम, दन्तुल, प्रियंगुमंजरी आदि की वेश-भूषा अलग-अलग है। नाटक में वेश-भूषा का अधिक महत्व रहता है। नाटक के प्रथम अंक में जब दन्तुल ने हारिण शावक को बाण से घायल किया है और कालिदास, मल्लिका उसे उठकार लाते हैं। तभी का संवाद आहार्य अभिनय को स्पष्ट करने में सक्षम है। यथा-

‘‘कालिदास     :      देख रहा हूँ कि तुम इस प्रदेश के निवासी नहीं हो।

दन्तुल       :      मैं तुम्हारी दृष्टि की प्रशंसा करता हूँ। मेरी वेश-भूषा ही इस बात का परिचय

देती है कि मैं यहाँ का निवासी नहीं हूँ।

कालिदास     :      मैं तुम्हारी वेश-भूषा को देखकर नहीं कह रहा।

दन्तुल        :      तो क्या मेरे ललाट की रेखाओं को देखकर ? जान पड़ता है चोरी के अतिरिक्त

                    सामुद्रिक का भी अभ्यास करते हो।

मल्लिका      :      तुम्हें ऐसा लाँछन लगाते लज्जा नहीं आती ?

दन्तुल        :      क्षमा चाहता हूँ देवी ? परन्तु यह हरिणशावक, जिसे बाँहों में लिए हैं, मेरे बाण

       से आहत हुआ है। इसलिए यह मेरी सम्पत्ति है। मेरी सम्पत्ति मुझे लौटा तो

       देंगी ?’’10

इस संवाद से स्पष्ट होता है कि दन्तुल की वेश-भूषा से स्पष्ट होता है कि वह एक राजपुरुष की वेश-भूषा है। कालिदास और मल्लिका की तुलना में अधिक सुंदर है। दन्तुल के वाणी में अधिकार की भाषा और क्षमा का स्वर भी है तो कालिदास और मल्लिका के भाषा में प्रेम की भाषा समझा रहे है। इन तीनों के आहार्य अभिनय से स्पष्ट होता है कि कौन किस भूमि से जुड़ा है।

सात्विक अभिनय :

‘सात्विक’ शब्द ‘सत्व’ से बना है। ‘सत्व’ गुण से पूर्ण होने का भाव होता है। इस शब्द के अन्य अर्थ है- प्रकृति, सहज स्वभाव, जीवन शक्ति, चेतना आदि। सात्विक भाव से तात्पर्य उन भावों से है जो प्रेरणा से सहज, सरल रूप से उत्पन्न होते हैं। अनुभव से तात्पर्य आश्रयगत आलंबन की उन चेष्टाओं से है, जिनसे उसके मन में जागृत भाव की सामाजिक अनुभूति होती है। सात्विक भावों की संख्या आठ मानी गई है। यथा- स्वेद (क्रोध, भय, हर्ष, लज्जा, दुख, श्रम, ताप, चोट, व्यायाम आदि से रोप कूपों में जल बिन्दुओं का प्रकट होना ही स्वेद है।), कंप (शीत, भय, हर्ष, क्रोध आदि के कारण शरीर काँपना ही कंप है।), रोमांच (भय, शीत, हर्ष, क्रोध, रोग आदि से शरीर के रोमों का उठ जाना ही ‘रोमांच’ है।), स्तभ (हर्ष, विषाद, भय, लज्जा, विस्मय आदि के कारण अंगों के संचालन में जो अवरोध उत्पन्न हो जाता है उसे ‘स्तंभ’ कहा गया है।), स्वरभंग (भय, हर्ष, क्रोध, वार्धक्य, रोग, कण्ठ से सूखने वाणी का खण्डित हो जाना ही स्वर भंग है।), अश्रु (क्रोध, आँखों में धुआँ लगने से, भय से, शोक से और आनन्द के आवेग से आँखों में जल बिंदुओं का आ जाना ही अश्रु है।), प्रलय (अधिक मेहनत, मूर्छा, भय, निद्रा, गंभीर चोट आदि से शरीर चेष्टाहीन हो जाना ही ‘प्रलय’ है।), वैवर्ण्य (शीत, क्रोध, भय, श्रम, रोग, क्लेश, ताप आदि से मुख का रंग बदल जाना ही वैवर्ण्य है।)। इस योग से उत्पन्न वे चेष्टाएं जिस पर हमारा वश नहीं होता उसे सात्विक अनुभव कहा जाता है। सात्विक अभिनय के लिए आठ प्रकारों से ही गुजरकर जाना पड़ता है। मेरा अनुमान है कि ‘सात्विक अभिनय’ में सबसे कठिन ‘आँसू’ अभिनय है। क्योंकि हँसाना तो ठीक है लेकिन सामने वाले को रूलाना बहुत ही कठिन कार्य है।

नाटककार ने सात्विक अभिनेय प्रयोग नाटकों में बडे ही कुशलता से किया है। मोहन राकेश के नाटकों में सात्विक अभिनेय प्रयोग हुआ है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक में जब कालिदास उज्जयिनी चला जाता है तो उसकी यादों में मल्लिका ने न जाने कितने अश्रु बहाएं है। मल्लिका कालिदास पर प्रेम करती थी। वह कालिदास का कवि के रूप में नाम देखना चाहती थी। इसलिए वह उज्जयिनी भेजना उचित समझती है। इस नाटक में सात्विक अभिनेय का प्रयोग मल्लिका के चरित्र के माध्यम से अधिक हुआ है। प्रस्तुत नाटक के द्वितीय अंक में जब मल्लिका को मिलने के लिए प्रियंगु आती है और मल्लिका से बातों-बातों में विवाह के लिए अनुनासिक और अनुस्वार का नाम लेती है। यह नाम मल्लिका सुनकर आँखों में आँसू आ जाते हैं। यथा-

‘‘प्रियंगु : सम्भवतः तुम दोनों में से किसी को भी अपने योग्य नहीं समझती। परन्तु राज्य में ये दो ही  

        नहीं, और भी अनेक अधिकारी हैं। मेरे साथ चलो। तुम जिससे भी चाहोगी… मल्लिका आसन   

        पर बैठ जाती है और रुँधे आवेश से अपना होंठ काट लेती है।

मल्लिका: इस विषय की चर्चा छोड़ दीजिए। (गला रुँध जाने से शब्द स्पष्ट ध्वनित नहीं होते। अन्दर

  का द्वार खुलता है और अम्बिका रोग और आवेश के कारण शिथिल और काँपती-सी बाहर    

  आकर जैसे अपने को सहेजने के लिए रुकती है।)

प्रियंगु  :  क्यों ? तुम्हारे मन में कल्पना नहीं है कि तुम्हारा अपना घर-परिवार हो ?’’11

      उक्त संवाद से स्पष्ट होता है कि जान बुझकर प्रियंगु ने मल्लिका के विवाह के बारे में विषय छेड़ती है। ताकि मल्लिका कालिदास को भूल जाएगी। जब प्रियंगु ने विवाह की बात की तो मल्लिका की स्पष्ट ध्वनि नहीं आ रही थी, वह अंदर ही अंदर रो रही थी। इसी प्रसंग से सात्विक अभिनय उभरकर आया है।

मूक अभिनय का प्रयोग :

मोहन राकेश के सभी नाटकों का अंत मुख्य पात्र के अभिनय से होता है, जहाँ मुद्रा और बिंब संवाद से भी अधिक कुछ कह जाते हैं। उदाहरण के लिए मल्लिका कालिदास को झरोखे से जाते हुए देखती है। उसके पैर बाहर बढ़ने लगते हैं, परंतु बच्ची को बाहों में देखकर वह वहीं जकड़ जाती है। नन्द मूक और स्तब्ध दिखाई देता है और फिर आहत भाव से चला जाता है। सुन्दरी भी कुछ नहीं कहती, केवल सिसकते हुए हथेलियों पर औंधी हो जाती है। ‘आधे अधूरे’ में लड़के की बाहें थामें महेंद्रनाथ की धुँधली आकृति घर के अंदर प्रवेश करती दिखाई देती है। ये दृश्य बिंब अनकहे शब्दों से बहुत कुछ कहते हैं। शब्दों के बीच के मूकाभिनय को लेकर राकेश प्रयोगशील थे। रंगमंच को जहाँ वे शब्द को माध्यम मानते थे, वहाँ शब्दों के अतिरिक्त मोह, उनकी बाढ़ को रंगानुभव के लिए बाधक भी मानते थे। इसलिए उन्होंने अपने नाटकों में ‘शब्द और मूक’ अभिनय का सुंदर समन्वय किया है। उन्हीं के शब्दों में ‘‘नाटकीय रंगमंच के अंतर्गत मूक अभिनय भी लंबी निःशब्दता की तरह शब्दों के बीच एक कड़ी है। शब्दों से उद्भूत बिंब में से एक बिंब यह भी हो सकता है, होता है। हमारा भाषा संस्कार इस बात का प्रमाण है कि शब्दों की यात्रा में बहुत बार बहुत कुछ अनकहे शब्दों द्वारा कहा जाता है।’’12 शब्दों के लेकर विविध प्रयोग राकेश के प्रयोगधर्मी का स्तर प्रदान करता है। राकेश के ‘आधे अधूरे’ नाटक में भी कई अनकहे शब्द हैं जो मूक अभिनय व्यक्त करने में सक्षम है।

मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’ और ‘आधे अधूरे’ नाटक में मूक अभिनय का प्रयोग प्रचूर मात्रा में हुआ है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक के तीसरे अंक में अंत में कालिदास का अभिनय मूक अभिनय अंतर्गत आत है। कालिदास सब कुछ छोड़कर मल्लिका के साथ जीवन अथ से आरंभ करना चाहते हैं। लेकिन समय बहुत ही बलवान होता है। कालिदास और मल्लिका के अंतिम संवाद से जब समाप्त हो जाता है अभिनय कालिदास का अभिनय मूक अभिनय है-

‘‘मल्लिका     : तुम कह रहे थे कि तुम फिर अथ से आरम्भ करना चाहते हो। (कालिदास निःश्वास

              छोड़ता है।)

कालिदास     : मैंने कहा था कि मैं अथ से आरंभ करना चाहता हूँ। यह संभवतः इच्छा का समय के

              साथ द्वन्द्व था। परंतु देख रहा हूँ कि समय अधिक शक्तिशाली है क्योंकि…।

मल्लिका      : क्योंकि ?

              (फिर अन्दर से बच्ची के रोने का शब्द सुनायी देता है। मल्लिका झट से अन्दर चली

              जाती है। कालिदास ग्रंथ आसन पर रखता हुआ जैसे अपने को उत्तर देता है।)

कालिदास     : क्योंकि वह प्रतीक्षा नहीं करता।

 (बिजली चमकती है और मेघ-गर्जन सुनायी देता है। कालिदास एक बार चारों ओर

 देखता है, फिर झरोखे के पास चला जाता है। वर्षा पड़ने लगती है। वह झरोखे के पास

 आकर ग्रंथ को एक बार फिर उठाकर देखता है और रख देता है। फिर एक दृष्टि

 अन्दर की ओर डालकर ड्योढ़ी में चला जाता है। क्षण-भर सोचता-सा वहाँ रुका रहता   

 है। फिर बाहर से दोनों किवाड़ मिला देता है। वर्षा और मेघ-गर्जन का शब्द बढ़ जाता  

 है। कुछ क्षणों के बाद मल्लिका बच्ची को वक्ष से सटाए अन्दर आती है और  

 कालिदास को न देखकर दौड़ती-सी झरोके के पास चली आती है।)

मल्लिका      : कालिदास ! (उसी तरह झरोखे के पास से आकर ड्योढ़ी से किवाड़ खोल देती है।)

              कालिदास !

 (पैर बाहर की ओर बढ़ने लगते हैं परन्तु बच्ची को बाँहों में देखकर जैसे वहीं जकड़

 जाती है। फिर टूटी-सी आकर आसन पर बैठ जाती है और बच्ची को और साथ

 सटाकर रोती हुई उसे चूमने लगती है। बिजली बार-बार चमकती है और मेघ-गर्जन

 सुनाई देता रहता है।)’’13

      उक्त संवाद से स्पष्ट होता है कि कालिदास सब कुछ त्यागकर मल्लिका के साथ फिर से जीवन शुरू करना चाहता है लेकिन बच्ची के रोने के आवाज से कालिदास समझ जाता है। मेघ गर्जना होती है कालिदास के पैर बाहर बढ़ने लगते हैं। अंत में कालिदास का संवाद न होकर मंच से चला जाता है। यहाँ पर मूक अभिनय का प्रयोग नाटककार ने बड़ी कुशलता से किया है।

      अतः कह सकते हैं कि राकेश ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ और ‘लहरों के राजहंस’ नाटक को ऐतिहासिक झरोके से आधुनिक जीवन की विसंगतियों को दर्शकों या पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है। तो ‘आधे अधूरे’ नाटक में मध्यवर्गीय परिवार की गाथा है। इन नाटकों में कायिक, वाचिक, आहार्य, सात्विक और मूक अभिनय प्रयोग हुआ है। प्रस्तुत नाटकों में राकेश ने हिंदी रंगमंच को एक दिशा दी है। मंच के दृष्टि से अनुपम योजना की है। जैसे- मंचीय उपकरण, बाक्स सेट, अंक विभाजन, ध्वनि योजना, प्रकाश योजना, संवादों की रचना, सुक्तियों का प्रयोग… अधूरे संवाद, बिंब योजना आदि के कारण अभिनेयता में सजीवता आयी है।

संदर्भ ग्रंथ सूची :

  1. भारतीय नाट्यशास्त्र और रंगमंच – रामसागर त्रिपाठी, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण, पृष्ठ- 30
  2. नाट्यशास्त्र – भरत मुनि, पृष्ठ- 6/29
  3. नाटक का रंगविधान – डॉ. विश्वनाथ मिश्र, कुसुम प्रकाशन, मुजफ्फनगर, प्रथम संस्करण, पृष्ठ- 160
  4. मोहन राकेश का नाट्य-शिल्प : प्रेरणा एवं स्रोत – डॉ. राजेश्वरप्रसाद सिंह, अमित प्रकाशन, गाजियाबाद, प्रथम संस्करण, पृष्ठ- 137
  5. हिंदी नाटक – डॉ. बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण, पृष्ठ – 229
  6. आधे अधूरे – मोहन राकेश, राजपाल एण्ड सन्स प्रकाशन, दिल्ली, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ- 37
  7. नाटक का रंगविधान – डॉ. विश्वनाथ मिश्र, कुसुम प्रकाशन, मुजफ्फनगर, प्रथम संस्करण, पृष्ठ- 157
  8. आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ- 97, 98
  9. रंगमंच – बलवंत गार्गी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, पृष्ठ 25
  10. आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ- 19, 20
  11. आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ- 74, 75
  12. आधुनिक नाटक का मसीहा: मोहन राकेश – गोविंद चातक, इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण, पृष्ठ- 166
  13. आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ- 109, 110

Last Updated on April 30, 2021 by srijanaustralia

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