न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

अनुवाद कला : विविध आयाम

पोपट भावराव बिरारी
सहायक प्राध्यापक
कर्मवीर शांतारामबापू कोंडाजी वावरे कला,
विज्ञान व वाणिज्य महाविद्यालय सिडको, नासिक
ईमेल – [email protected], मो. – 9850391121

सार

अनुवाद का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत महत्त्व बढ़ा है। विश्व में अनेक भाषाओं का प्रचलन रहा है। इसलिए उन भाषाओं में जो विचार एवं भाव है, वह समझने के लिए वहां पर अनुवाद की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार हर जनसमूह का भौगोलिक परिवेश अलग-अलग होता है; उसी प्रकार हर जनसमूह की भाषा भी जगह के अनुसार अलग होती है। अतः यह स्पष्ट है कि सभी भाषाओं को एक ही व्यक्ति नहीं समझ सकता है। इसलिए जो भी विचार है वह दूसरों तक प्रदर्शित करने के लिए आज अनुवाद एक साधन के रूप में काम कर रहा है। समकालीन परिप्रेक्ष्य में विभिन्न भाषाओं में अनूदित साहित्य सृजन हो रहा। उसी प्रकार वहां पर एक भाषा को दूसरी भाषा में अनूदित करने के लिए अनुवादको की भी आवश्यकता निर्माण हुई हैं। उन दोनों भाषाओं को समझनेवाले अनुवादक का महत्व अधिक बढ़ा है। अनुवाद ही वह साधन है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपनी बात या विचार भाषा के माध्यम से दूसरे तक पहुंचा पाता हैं। भाषा ही अनुवाद की बड़ी शक्ति है जो मानव प्रत्यक्ष जीवन में उपयोग करता है। हर क्षेत्र विशेष में लोगों के रीति रिवाज के अनुसार मुहावरे, कहावतें एवं लोकगीत अलग-अलग होते है। उसी प्रकार कहने का ढंग भी अलग-अलग होता है। ऐसे में अनुवाद आवश्यक होता है। अनुवादक को दोनों भाषाओं से परिचित होना पड़ता है। तभी वह सफल अनुवाद कर पाता है। आज विज्ञान के विकास से कोई भी देश परस्पर दूर नहीं लग रहा है, बल्कि वे भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से और भी नजदीक आ गए है। अतः अनुवाद एक कला है। इस दृष्टि से इस पर विचार होना आवश्यक है।

अनुवाद : व्युत्पत्ति एवं अर्थ

’अनुवाद‘ शब्द संस्कृत के ’वद्‘ धातु से बना है। ’वद्‘ का अर्थ है ‘बोलना’ या ‘कहना’। संस्कृत के ‘वद्’ धातु में ‘घञ’ प्रत्यय जोड़ देने पर भाववाचक संज्ञा में इसका परिवर्तित रूप है ‘वाद’। ‘वाद’ का अर्थ हुआ ‘कहने की क्रिया’ या ‘कही हुर्इ बात’। ‘वाद’ में ‘अनु’ उपसर्ग जोड़कर ‘अनुवाद’ शब्द बना है, जिसका अर्थ है ‘प्राप्त कथन को पुनः कहना’। डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार अनुवाद का अर्थ है “पुनः कथन’ या ‘किसी के कहने के बाद कहना”1 ‘पुन: कथन’ में अर्थ की पुनरावृत्ति होती है, शब्दों की नहीं। हिन्दी में अनुवाद के स्थान पर प्रयुक्त होनेवाले अन्य शब्दो में छाया, टीका, उल्था, भाषान्तर आदि का प्रयोग होता हैं। अन्य भाषाओं में ‘अनुवाद’ के समानान्तर प्रयोग होनेवाले शब्द इस प्रकार से हैं- ट्रांसलेशन (अंग्रेजी), ट्रडुक्शन (फ्रेंच), भाषान्तर (संस्कृत, कन्नड़, मराठी), तर्जुमा (अरबी), मोषिये चण्र्यु (तमिल), अनुवादम् (तेलुगु), अनुवाद (हिन्दी, पंजाबी, सिंधी) आदि ।

अनुवाद की परिभाषा

(अ) भारतीय विद्वानों के अनुसार

  1. देवेन्द्रनाथ शर्मा : ‘विचारों को एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपान्तरित करना अनुवाद है।’
  2. भोलानाथ तिवारी : ‘किसी भाषा में प्राप्त सामग्री को दूसरी भाषा में भाषान्तरण करना अनुवाद है, दूसरे शब्दों में एक भाषा में व्यक्त विचारों को यथा सम्भव और सहज अभिव्यक्ति द्वारा दूसरी भाषा में व्यक्त करने का प्रयास ही अनुवाद है।’
  3. रीतारानी पालीवाल : ‘स्रोत-भाषा में व्यक्त प्रतीक व्यवस्था को लक्ष्य-भाषा की सहज प्रतीक व्यवस्था में रूपान्तरित करने का कार्य अनुवाद है।’

आ) पाश्चात्त्य विद्वानों के अनुसार

  1. नाइडा : ‘अनुवाद का तात्पर्य है स्रोत-भाषा में व्यक्त सन्देश के लिए लक्ष्य-भाषा में निकटतम सहज समतुल्य सन्देश को प्रस्तुत करना। यह समतुल्यता पहले तो अर्थ के स्तर पर होती है फिर शैली के स्तर पर।’
  2. कैटफोड : ‘एक भाषा की पाठ्य सामग्री को दूसरी भाषा की समानार्थक पाठ्य सामग्री से प्रतिस्थापना ही अनुवाद है।’ 1.मूल-भाषा (भाषा) 2. मूल भाषा का अर्थ (संदेश) 3. मूल भाषा की संरचना (प्रकृति)
  3. सैमुएल जॉनसन : ‘मूल भाषा की पाठ्य सामग्री के भावों की रक्षा करते हुए उसे दूसरी भाषा में बदल देना अनुवाद है।’

अनुवाद की प्रक्रिया

अनुवाद की एक प्रक्रिया होती है। रीतारानी पालीवाल का कथन है कि “अनुवाद चाहे वैज्ञानिक हो अथवा साहित्यिक, उसमें सृजनात्मकता की प्रक्रिया हर स्थिति में अंतर्निहित रहती हैं।”2 अनुवाद-प्रक्रिया को नाइडा, न्यूमार्क और बाथगेट इन तीनों विद्वानों ने अपने – अपने ढंग से प्रस्तुत किया गया है। वास्तव में अनुवाद करते हुए स्त्रोत भाषा के पाठ के अर्थ को लक्ष्य भाषा में अर्थ के सबसे नजदीकी बिन्दु तक बदलने की कोशिश की जाती है। नाइडा ने अनुवाद-प्रक्रिया में निम्नलिखित तीन सोपानों का उल्लेख किया है : 1) विश्लेषण (Analysis) 2) अन्तरण (Transference) 3) पुनर्गठन (Restructuring)

नाइडा ने पहले सोपान में अनुवादक मूल-पाठ या स्रोत-भाषा का विश्लेषण दर्शाया है। यह विश्लेषण भाषा के दोनों स्तर, बाह्य संरचना पक्ष तथा आभ्यन्तर अर्थपक्ष पर होता है, जिसमें मूल-पाठ का शाब्दिक अनुवाद तैयार हो जाता है। विश्लेषण से प्राप्त अर्थबोध का लक्ष्य-भाषा में अन्तरण अनुवाद का दूसरा सोपान होता है। तीसरे सोपान में लक्ष्य-भाषा की अभिव्यक्ति प्रणाली और कथन रीति के अनुसार उसका निर्माण होता है।

अनुवादक के गुण

अनुवादक (translator) स्रोतभाषा के पाठ को अर्थपूर्ण रूप से लक्ष्य भाषा में अनूदित करने का कार्य करता है। अनुवाद कार्य के लिए अनुवादक में आवश्यक गुण होने चाहिए। अनुवादक के गुण निम्नलिखित है – 1) भाषाओं का समुचित ज्ञान, 2) सम्बन्धित विषय का सम्पूर्ण ज्ञान, 3) स्वतंत्र विचार शक्ति, 4) लोकोत्तर मेधा और आनंद कौशल, 5) अनुवाद विधा का ज्ञान, 6) व्याकरण का ज्ञान, 7) प्रामाणिक्ता और मौलिकता

अनुवाद का क्षेत्र

वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में अनुवाद का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। आधुनिक काल में अनुवाद का प्रयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है, क्योंकि विश्व में कई भाषाएं बोली जाती है; एक भाषा के भावों या विचारों की अभिव्यक्ति दूसरे भाषी व्यक्ति तक पहुंचे इसलिए अनुवाद कार्य बड़ी तेजी से हो रहा है। अनुवाद के क्षेत्र निम्नलिखित रुप से प्रस्तुत है – सरकारी कार्यालय, न्यायालय, शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अंतरराष्ट्रीय संबंध, संस्कृति, साहित्य, जनसंचार माध्यम।

अनुवाद : वर्गीकरण

डॉ. भोलानाथ तिवारी ने ‘अनुवाद की व्यावहारिक समस्याएं’ इस ग्रंथ में अनुवाद के भेद या प्रकारों के मुख्य चार आधार बताए हैं। वह निम्नलिखित रुप से है –

अ) अनुवाद के गद्यपद्य होने के आधार पर

१) गद्यानुवाद २) पद्यानुवाद ३) मुक्तछंदानुवाद

) साहित्यिक विधा के आधार पर

१) काव्यानुवाद २) नाटकानुवाद ३) कथानुवाद

इ) विषय के आधार पर

१) सरकारी रिकार्डो का अनुवाद २) गेजेटियरों का अनुवाद ३) पत्रकारिता से संबंध अनुवाद ४) विधि का अनुवाद ५) ऐतिहासिक साहित्य का अनुवाद ६) धार्मिक साहित्य का अनुवाद ७) ललित साहित्य का अनुवाद

ई) अनुवाद की प्रकृति के आधार पर

१) मूलनिष्ठ अनुवाद २) मूलमुक्त अनुवाद

अनुवाद के प्रकार

डॉ. भोलानाथ तिवारी ने अनुवाद की प्रकृति के आधार पर अनुवाद के कुछ अन्य भेद या प्रकारों का भी उल्लेख किया है। जो तत्वतः मूलनिष्ठ और मूलमुक्त से भिन्न नहीं है। यह अन्य प्रकार अधोलिखित है –

1) शब्दानुवाद : प्रत्येक शब्द के बदले प्रतिशब्द देने के कारण इसे शब्दानुवाद कहा जाता है। स्रोत-भाषा के शब्द तथा शब्द क्रम को उसी प्रकार लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरित करना शब्दानुवाद है। अनुवादक का लक्ष्य मूल-भाषा के विचारों को रूपान्तरित करने से अधिक शब्दों का ज्यों का त्यों अनुवाद करने से होता है। शब्द एवं शब्द क्रम की प्रकृति हर भाषा में भिन्न होती है।

2) भावानुवाद : साहित्यिक रचनाओं के बारे में भावानुवाद का विशेष महत्त्व होता है। इस अनुवाद में मूल-भाषा के भावों, विचारों एवं संवेदनाओं को लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरित किया जाता है। भोलानाथ तिवारी के अनुसार “इस प्रकार के अनुवाद में मूल शब्द,वाक्यांश, वाक्य आदि पर ध्यान न देकर भाव अर्थ या विचार पर ध्यान दिया जाता है।”3 भावानुवाद में सम्प्रेषणीयता सबसे महत्त्वपूर्ण होती है। इसमें अनुवादक का लक्ष्य स्रोत-भाषा में अभिव्यक्त भावों, विचारों एवं अर्थों का लक्ष्य-भाषा में रूपांरित करना होता है। संस्कृत साहित्य में लिखित कुछ ललित निबन्धों के हिन्दी में अनुवाद बहुत ही प्रभावी सिद्ध हुए हैं।

3) छायानुवाद : “छाया’ संस्कृत का बहुत पुराना शब्द है और इसका प्रयोग नाटकों में यत्र-तत्र दृष्टिगत होता है। संस्कृत पाठ की छाया जब हिंदी पाठ पर होती है तो उसे छायानुवाद कहा जाता है।”4 अनुवाद सिद्धान्त में छाया शब्द का प्रयोग बहुत पुराना है। इसमें मूल-पाठ की अर्थ छाया को ग्रहण करके अनुवाद किया जाता है। छायानुवाद में शब्दों तथा भावों के संकलित प्रभाव को लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरित किया जाता है। संस्कृत में लिखा कालिदास का नाटक ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ हिन्दी अनुवाद का उत्कृष्ट उदाहरण रहा है।

4) सारानुवाद : किसी भी विस्तृत विचार अथवा सामग्री का संक्षेप में अनुवाद प्रस्तुत करना सारानुवाद है। लम्बी रचनाओं, राजनैतिक भाषणों, प्रतिवेदनों आदि व्यावहारिक कार्य के अनुवाद के लिए सारानुवाद बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। रीतारानी पालीवाल का कथन है कि “भाषणों, संसद में दिए गए वक्तव्यों तथा बहसों का अनुवाद इसी कोटि में आता है।”5 इसतरह के अनुवाद में मूल-भाषा के कथ्य को सुरक्षित रखते हुए लक्ष्य-भाषा में उसका रूपान्तरण किया जाता है।

5) व्याख्यानुवाद : व्याख्यानुवाद को भाष्यानुवाद के नाम से भी जाना जाता है। इस अनुवाद में अनुवादक मूल सामग्री के साथ-साथ उसकी व्याख्या भी प्रस्तुत करता है। व्याख्यानुवाद में अनुवादक का व्यक्तित्व महत्त्वपूर्ण हो जाता है। बाल गंगाधर तिलक द्वारा किया गया ‘गीता’ का अनुवाद इसी का परिचायक है।

6) सहज अनुवाद : यह अनुवाद का आदर्श प्रकार है। जिसमें अनुवादक स्रोत भाषा की मूल सामग्री का अनुवाद अर्थ तथा अभिव्यक्ति सहित लक्ष्य भाषा में निकटतम और स्वाभाविक समानार्थी द्वारा करता है। इस अनुवाद में अनुवादक तटस्थ भूमिका निभाता है। अनुवाद में अनुवादक के भाव तथा विचार आदि की छाया अनुवादित सामग्री पर नहीं पड़ती है। इसे स्वाभाविक सटीक अनुवाद भी कहा जाता है। अनुवादक यथासंभव अपना व्यक्तित्व नहीं आने देता है, अनुवादक का प्रयास यह होता है कि मूल को पढ़ या सुनकर स्रोत भाषा भाषी जो ग्रहण करें, अनुवाद को सुनकर लक्ष्य भाषा भाषी भी ठीक वही ग्रहण करें।

 अनुवाद का महत्व

  1. अनुवाद तकनीकी के विकास में सहायक है। जब हम एक अंतरिक्षीय भाषा की खोज में लगे हैं, उसके पूर्व अनुवाद को माध्यम बनाकर समस्त तकनीकी ज्ञान को विकासात्मक स्थिति में एकात्मक दिशा देने के लिए अनुवाद सहायक सिद्ध होता है।
  2. प्रशासन संबंधी जानकारी प्राप्त करने का स्त्रोत उस देश की भाषा के अनुवादों द्वारा ही संभव है। अपने देश की शासन प्रणाली संबंधित तथ्य के लिए अनुवाद साधन के रूप में सिद्ध होता है।
  3. आज के युग में नित्य नवीन शब्दों का विकास हो रहा है, इन शब्दों की जानकारी का माध्यम अनुवाद ही हो सकता है।
  4. वैश्वीकरण के प्रचार के कारण अनेक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से अनुवाद अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। भिन्न-भिन्न भाषी देशों की राजनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक नीतियों के लिए आशु अनुवाद से विभिन्न नीतियों का आदान प्रदान संभव हो जाता है।
  5. विश्व मैत्री के लिए आज के संदर्भ में अनुवाद अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। माननीय अधिकारियों की जानकारी , परस्पर आदान-प्रदान करनेवाले भाव से मैत्री स्थापना, शिष्ट मंडलों के प्रति उदारता आदि के विकास में अनुवाद सहायक सिद्ध होता हैं।
  6. अनुवाद विज्ञान के अध्ययन से कैरियर निर्माण की दिशा की ओर भी बढ़ा जा सकता है। पर्यटन, व्यापार, तकनीकी आदि के क्षेत्र में सदैव ही अनुवाद की आवश्यकता होती हैं।
  7. संचार माध्यमों में अनुवाद का महत्व बढ़ा है। दूरदर्शन, फिल्मो, सीरियलों, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से विश्व के कार्यकलापों, गतिविधियों आदि की जानकारी अनुवाद के माध्यम से प्राप्त होती है। भाषाओं की कला- चेतन के बारे में अनुवाद ही परिचित कराता है।
  8. एक भाषा की प्रतिभा का परिचय अनुवाद द्वारा सफलता से प्राप्त किया जा सकता है। हमारे देश के कालिदास, सूरदास, तुलसीदास, बिहारी एवं प्रेमचंद आदि साहित्यकारों का साहित्य अनुवाद के स्रोतों द्वारा ही विदेशों में सम्मान प्राप्त कर रहा हैं। उस साहित्य से ही हमारी संस्कृति एवं सभ्यता के दर्शन होते हैं, वह अनुवाद द्वारा व्यापक धरातल तक पहुंच पाए हैं।

अनुवाद की समस्याएँ

एक भाषा में अभिव्यक्त विषयों, भावनाओं और संवेदनाओं को जहाँ तक संभव हो सके उसी की प्रयुक्त भाषा-शैली में दूसरी भाषा में रूपांतरित करना अनुवाद कहलाता है। फिर भी यह कार्य जितना सरल दिखाई देता है उतना वास्तव में है नहीं ; क्योंकि हर भाषा की भाषिक संरचना में कुछ अंतर होता है। अनुवाद की समस्याएँ निम्नांकित हैं –

  1. शब्द प्रयोग की समस्या – कभी-कभी एक ही भाषाओं के दो शब्द मिल जाते है जिसका अर्थ अलग-अलग होता है। जैसे-मराठी में ‘नवरा’ का अर्थ पति है जबकि गुजराती में निठल्ले को ‘नवरा’ कहते है।
  2. मुहावरो एवं कहावतो से संबंधित समस्या – मुहावरे एवं कहावते मनुष्य जीवन के अनुभावों को प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त करते हैं। परन्तु हर मुहावरे या कहावते एक जैसे नहीं हो सकते। अनुवादक को यदि लोक परंपरागत रीति-रिवाजों का प्रादेशिक ज्ञान नहीं है तो वह कहावतों का सफल अनुवाद नहीं के सकेगा।
  3. अलंकार की समस्या – एक भाषा के अलंकार उस भाषा के शब्द को सौन्दर्य प्रदान करते है। “कनक-कनक” में यमक अलंकार दुहरे अर्थ में प्रयोग अनुवाद के लिए एक गंभीर समस्या बन जाती है।
  4. शैली की समस्या – हर भाषा की अपनी शैली होती है। परन्तु अगर एक भाषा में उपलब्ध शैली विशेषताएँ दूसरी में न मिले तो अनुवाद करने में बड़ी परेशानी होती है।

निष्कर्ष

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि एक भाषा की सामग्री दूसरी भाषा में ले जाना अनुवाद है। अनुवाद में मूल कथ्य का भाव सुरक्षित रखना पड़ता है। भाषाओं की प्रकृति भिन्न-भिन्न होने के कारण शत-प्रतिशत अनुवाद कार्य संभव नहीं हो पाता लेकिन मूल अर्थ के अधिक से अधिक निकट जाने का प्रयास अवश्य किया जाता है। दोनों भाषाओं की प्रकृति जितनी समान होती है उतना ही अनुवाद कार्य आसान हो जाता है। अनुवाद आधुनिक जीवन की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप धारण कर चुका है। संचार माध्यमों ने जिस प्रकार विश्व को एक देहातों में बदला हुआ देखा। उसी प्रकार अनुवाद कार्य ने विश्व संस्कृति को विविधता में एकता का अनुभव करा दिया है। अनुवाद के अनेकानेक व्यवहारिक उपयोग है। उसी तरह सैद्धांतिक ज्ञान और सांस्कृतिक उपलब्धि के रूप में भी महत्वपूर्ण है। न्यायालय, सरकारी कार्यालय, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, पत्रकारिता, साहित्य एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध आदि क्षेत्रों में अनुवाद उपादेय सिद्ध होता है। देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में अनुवाद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

संदर्भ ग्रंथ

1) डॉ. भोलानाथ तिवारी, अनुवाद विज्ञान, अमर प्रिंटिंग प्रेस नई दिल्ली, प्र.सं. 1972, पृ. 9

2) डॉ.रीतारानी पालीवाल, अनुवाद प्रक्रिया, ललित प्रकाशन दिल्ली, प्र. सं. 1982, पृ.17

3) डॉ.भोलानाथ तिवारी, अनुवाद विज्ञान, अमर प्रिंटिंग प्रेस नई दिल्ली, प्र.सं.1972, पृ.28

4) डॉ.रीतारानी पालीवाल, अनुवाद प्रक्रिया, ललित प्रकाशन दिल्ली, प्र.सं.1982, पृ. 26

5) वही, पृ. 26

Last Updated on December 5, 2020 by srijanaustralia

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