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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

नज़ीर अकबराबादी की ग़ज़लगोई

नज़ीर अकबराबादी की ग़ज़लगोई

डॉ वसीम अनवर

सहायक प्रोफेसर

उर्दू और फ़ारसी विभाग

डॉ हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश
[email protected], 09301316075

नज़ीर अकबराबादी उर्दू के पहले अवामी शायर तस्लीम किए जाते हैं। वो अवाम के शायर थे और इन्होंने अवामी ज़िंदगी के मसाइल को अपनी शायरी का मौज़ू बनाया। वो ज़िंदगी के हर पहलू पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते हैं और शिद्दत से महसूस करते हुए शायरी का जामा पहना देते हैं। आम तौर पर उन्हें नज़्म के शायर की हैसियत से शौहरत-ओ-मक़बूलियत हासिल है और बहैसीयत नज़्म निगार उनकी अज़मत से किसी को इनकार नहीं है। लेकिन नज़ीर की ग़ज़लें भी अपनी एहमीयत रखती हैं। जो उन्हें ग़ज़लगो शायरों की सफ़ में जगह दिलाने के लिए काफ़ी हैं।
नज़ीर अकबराबादी के शेअरी सफ़र का आग़ाज़ एक ऐसे वक़्त हुआ जब उर्दू ग़ज़ल के अज़ीम शायर मीर तकी मीर की मक़बूलियत बाम-ए-उरूज पर थी। अकबराबाद ( आगरा ) में जब नज़ीर ने मीर के साथ एक मुशायरे में शिरकत की और हिम्मत के साथ एक ग़ज़ल पढ़ी तो मीर तकी मीर उस नौजवान शायर का कलाम सुनकर मुतवज्जा हुए और नज़ीर के कलाम की तारीफ़ की। इस से ये बात वाज़िह है कि नज़ीर ने अपनी शायरी बड़े जोश-ओ-ख़ुरोश से शुरू की। इस वाक़्या का ज़िक्र करते हुए वहाब अशर्फ़ी लिखते हैं:
“एक रिवायत में है कि नज़ीर ने मीर तकी मीर से भी मुलाक़ात की थी या एक बज़्म में दोनों शरीक हुए थे।“(1)
नज़ीर की ग़ज़ल का मतला था:
नज़र पड़ा इक बुत परीवश, निराली सज-धज नई अदा का
जो उम्र देखो तो दस बरस की पे क़हर-ओ-आफ़त ग़ज़ब ख़ुदा का
इस के बाद नज़ीर की शौहरत और मक़बूलियत में इज़ाफ़ा हुआ और उनका शुमार अच्छे शायरों में होने लगा।
नज़ीर अकबराबादी अपने वक़्त के पहले शायर हैं जिन्होंने ज़माने की डगर को एक तरफ़ छोड़कर शायरी की, क्यों कि ये ज़माना ग़ज़लगोई के उरूज का ज़माना था, और इस दौर में ज़्यादातर ग़ज़लें ही लिखी जाती थीं। लेकिन नज़ीर ने नज़्म निगारी की तरफ़ तवज्जा की और इस में मुकम्मल कामयाबी भी हासिल की, लिहाज़ा नज़्म निगारी का बाक़ायदा आग़ाज़ नज़ीर ने ही किया। चूँकि उस ज़माने में ग़ज़ल मक़बूल-ए-ख़ास-ओ-आम थी, इस लिए नज़ीर भी वक़तन फ़वक़तन ग़ज़ल में तब्अ-आज़माई करते रहे। उनकी ग़ज़लों में रिवायती अंदाज़ के इलावा ग़म-ए-इशक़ और कैफ़-ए-इशक़ की ख़ुसुसियात पाई जाती हैं।
ग़ज़लों में उनका उस्लूब पूरी तरह दुनिया की ना-गुफ़्ता बही से मुताल्लिक़ है, लिहाज़ा वो लिखते हैं:
तल्ख़ी-ए-मर्ग जिसे कहते हैं अफ़सोस, अफ़सोस
इक दिन सब के तईं ज़हर ये खाना होगा
नज़ीर की ग़ज़लें भी इन्फ़िरादी शान रखती हैं। इन ग़ज़लों को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। नज़ीर के बारे में ये कह कर दामन बचाना मुश्किल है कि उनकी ग़ज़लों में मामूली क़िस्म के जज़्बात की तर्जुमानी की गई है और उनमें ग़ज़ल की रवायात को सही तौर पर बरता नहीं गया। ये बात ज़रूर है कि उनके कलाम में ऐसी ग़ज़लें ख़ासी तादाद में मौजूद हैं। नज़ीर एक जीनियस इन्सान थे यही वजह है कि उन पर सौक़ियत का इल्ज़ाम लगाया गया और मुताद्दिद तज़किरा निगारों ने उन्हें शायरों की सफ़ में शुमार नहीं किया। शेफ़्ता ने गुलशन-ए-बेख़ार, में लिखा है कि:
“इस के बहुत से अशआर सौक़ियों की ज़बान पर जारी हैं और उन अशआर पर नज़र रखते हुए उसे शायरों की सफ़ में शुमार ना करना चाहिए।“(2)
लिपट लिपट के में इस गुल के साथ सोता था
रक़ीब सुबह को मुँह आँसूओं से धोता था
नज़ीर के दीवान में काफ़ी तादाद में ग़ज़लें मौजूद हैं इन ग़ज़लों का तसलसुल रिवाज के मुताबिक़ नहीं था शायद इसी वजह से इस ज़माने के दूसरे शायर और तज़किरा निगारों ने उनके कलाम को एहमीयत नहीं दी। मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने अपने तज़किरे आब-ए-हयात मैं नज़ीर को जगह नहीं दी। शेफ़्ता, नज़ीर को बाज़ारी शायर कह कर नज़रअंदाज कर देते हैं सय्यद अहमद देहलवी ने भी नज़ीर के बारे में इतना इशारा किया है
”बाज़ दिल्ली के तज़किरा-हाय-शौअरा जमा करने वालों ने सिर्फ इतना लिखा है कि वो एक मुल्ला मकतबी सहत-ए-अलफ़ाज़ से मुअर्रा पुरगो और अवामुन्नास बल्कि जुहला की ज़बान बोलने वाला था।“(3)
नज़ीर की ग़ज़लों में नज़्मिया शायरी के असरात साफ़ दिखाई देते हैं उनकी ग़ज़लों में एक किस्म का तसलसुल पाया जाता है लेकिन ये तसलसुल नज़्म जैसा नहीं, इबादत बरेलवी रक़मतराज़ हैं:
“नज़ीर की ख़ूबी ये है कि उन्होंने इस तफ़सील व जुज़ईआत और जिद्दत और उपज को ग़ज़ल के लिए गवारा बना दिया है उनकी बेशतर ग़ज़लें तसलसुल की हामिल हैं। ये तसलसुल इस जोश और वलवले का नतीजा है जिसने उनके यहां तफ़सील-ओ-जुज़ईआत के अनासिर को पैदा किया है लेकिन ये तसलसुल नज़्म की सूरत इख़तियार नहीं करता। बल्कि उनकी ग़ज़लों में मूड की हम-आहंगी के रूप में ज़ाहिर होता है।“(4)
नज़ीर की ग़ज़ल-ए-मुसलसल का एक हिस्सा मुलाहिज़ा हो:
ये जो उठती कोन्पल है जब अपना बर्ग निकालेगी
डाली डाली चाटेगी और पत्ता पत्ता खा लेगी
होनहार बरवा के पत्ते चिकने चिकने होते हैं
बहुत नहीं कुछ थोड़े ही दिन में बेल फंग को आ लेगी
अभी तो किया है छुटपन है नादानी है बे-होशी है
क़हर तो इस दिन होवेगा जब अपना होश सँभालेगी
नाज़ अदा और ग़मज़ों के कुछ और ही कतरेगी गुल फूल
सीन लगावट चितवन का भी और ही इत्र निकालेगी
काजल मेहंदी पान मिस्सी और कंघी चोटी में हर-आन
क्या-क्या रंग बनावेगी और क्या-क्या नक़्शे ढालेगी
जब ये तन गदरावेगा और बाज़ू बाँहें होंगे गोल
इस दम देखा चाहिए क्या-क्या पेट के पांव निकालेगी
किस-किस का दिल धड़केगा और कौन मलेगा हाथों को
पकेंगे जब अंगया में ये कच्चे सेब उछालेगी
नज़ीर ने ग़ज़ल की हैय्यत में मौज़ूआती ग़ज़लें लिखने पर तवज्जा दी, ग़रज़ नज़ीर की ग़ज़ल उस दौर के दूसरे ग़ज़लगो शौअरा से मुख़्तलिफ़ नज़र आती हैं। ग़ज़ल का हर शेअर एक इकाई होता है इस का दूसरे अशआर से बराह-ए-रास्त कोई ताल्लुक़ नहीं होता है, लेकिन नज़ीर की ग़ज़लों में चीदाकारी के बजाय एक तसलसुल है जिसकी वजह से उनकी ग़ज़लों पर भी नज़्मों का गुमान होता है:
तन-ए-मुर्दा को क्या तकल्लुफ़ से रखना
गया वो तो जिससे मुज़य्यन ये तन था
कई बार हमने ये देखा कि जिनका
मुशब्बन बदन था मुअत्तर कफ़न था
जो क़ब्र कुहन उनकी उखड़ी तो देखा
ना उज़ु-ए-बदन था ना तार-ए-कफ़न था
नज़ीर आगे हमको हवस थी कफ़न की
जो सोचा तो नाहक़ का दीवानापन था
नज़ीर अकबराबादी ने नज़्मों की तरह ग़ज़लों में भी मंज़र-निगारी के नमूने मौजूद हैं। नज़ीर अपनी ग़ज़लों में ख़ूबसूरत मनाज़िर की तस्वीरकशी करते हैं। ये बात ज़हन नशीन रखनी चाहिए कि मनाज़िर की तस्वीरकशी में उन्हें दर्जा-ए-कमाल हासिल है। एक ग़ज़ल में आंधी का मंज़र इस तरह पेश किया है, मुलाहिज़ा हो:
बगोले उठ चले थे और ना थी कुछ देर आंधी में
कि हमसे यार से आ हो गई मुड़भेड़ आंधी में
जता कर ख़ाक का उड़ना दिखा कर गर्द का चक्कर
वहीं हम ले चले उस गुल-बदन को घेर आंधी में
नज़ीर की शायरी में दुनिया-भर के मौज़ूआत शामिल हैं, तंज़-ओ-ज़र्राफ़त का अंसर भी ख़ासा नुमायां है। तंज़-ओ-ज़र्राफ़त को नज़ीर ने बतौर-ए-ख़ास नहीं अपनाया बल्कि ये ख़ुसुसियत कलाम-ए-नज़ीर में ज़िमनी तौर पर पैदा हो गई है। चंद अशआर मुलाहिज़ा हो:

अगर वो शोला-रू पूछे मेरे दल के फफूलों को
तो उस के सामने इक खोशा-ए-अंगूर ले जाना
जो ये पूछे कि अब कितनी है उस के रंग पर ज़र्दी
तो यारो तुम गुल सद्बर्ग या काफ़ूर ले जाना
नज़ीर की शायरी में फ़िक्र-ओ-फ़लसफ़ा की तलाश बेसूद है। ज़िंदगी की रंग-रलियाँ और ज़िंदगी के हल्के फुल्के मुआमलात उनकी शायरी के मौज़ूआत हैं। नज़ीर को चुटकुलेबाज़ शायर कहा जाता है। ख़ुद नज़ीर ने अपनी ग़ज़ल के एक शेअर में अपनी चुटकुलेबाज़ी की तरफ़ इशारा किया है शेअर मुलाहिज़ा हो
सब जानते हैं चुटकुलेबाज़ी नज़ीर की
इस के हर सुख़न में है अय यार चुटकुला
नज़ीर की ग़ज़लों में जज़्बात-ओ-एहसासात और क़लबी वारदात को पेश किया गया है। जो उनके दिल पर गुज़रती है साफ़ वही बात अशआर में ढल जाती हैं। यानी वो आप-बीती को अपने अशआर का मौज़ू बनाते हैं। इबादत बरेलवी नज़ीर के बारे में लिखते हैं:
”नज़ीर इन ग़ज़लों में बग़ैर किसी झिजक के वो सब कुछ समो देते हैं जवान पर गुज़रती है जिससे वो दो-चार होते हैं या दो-चार होने की उन्हें तमन्ना है।“(5)
नमूना-ए-कलाम मुलाहिज़ा फ़रमाएं:
तमाम रात थी और कुहनीयाँ-ओ-लातें थीं
ना सोने देता था मुझको ना आप सोता था
नज़ीर ने अपनी ग़ज़लों में जो माहौल पैदा किया है वो ताय्युश का माहौल नहीं है, ताय्युश पसंदी अगर जिस्मानी तौर पर नहीं तो कम अज़ कम ज़हनी और जज़्बाती तौर पर एक ग़ैर सेहत मंदी की दलील ज़रूर है। नज़ीर की ग़ज़लों में ताय्युश पसंदी का ख़्याल ना होने के बराबर है। किसी हद तक  बोवल्हव्सी उसी को कह सकते हैं लेकिन ये बोवल्हव्सी भी एक सेहतमंद इन्सान की बोवल्हव्सी है:
लिखें हम ऐश की तख़्ती को किस तरह ए जां
क़लम ज़मीन के ऊपर दवात कोठे पर
नज़ीर ग़ज़ल के तक़ाज़ों से पूरी तरह वाक़िफ़ थे और उनकी ग़ज़लों में रिवायती इशक़ के नमूने मौजूद हैं। उनकी ग़ज़लों में ज़िक्र-ए-महबूब की उम्दा मिसालें दिखाई देती हैं। नज़ीर अपनी ग़ज़लों के अशआर में इशक़-ओ-आशिक़ी के मज़ामीन पेश करते हैं। उनके इश्क़िया अशआर अपना मुनफ़रद रंग रखते हैं। नज़ीर के चंद अशआर मुलाहिज़ा हों:
कल उस के चेहरे को हमने जो आफ़ताब लिखा
तो उसने पढ़ के वो नामा बहुत इताब लिखा
इस परी रू से चला फिर दिल लगाने को नज़ीर
क्या कहें ये शख़्स भी कोई अजब दीवाना है
नज़ीर के तसव्वुर-ए-इशक़ के मुताल्लिक़ शकील उल रहमान रक़म तराज़ हैं:
”नज़ीर की ग़ज़लों में दो पैकरों की मुहब्बत अपनी सरशारी और रूमानियत से मुतास्सिर तो करती ही है साथ ही इशक़ का ऐसा तसव्वुर भी सामने आ जाता है जो इशक़-ए-इलाही और इशक़ दरवेश की अंदरूनी कैफ़ीयत और इस के रद्द-ए-अमल को नुमायां और ज़ाहिर करता है। उनकी ग़ज़लों में महबूब गोश्त पोश्त का पैकर भी है और ज़ात-ए-इलाही भी। शरार-ए-हुस्न के शोले से तूर जल कर ख़ाक हो जाता है और गुल-बदन के दिल में थोड़ी सी हमदर्दी आशिक़ के अंदर एक गुलज़ार पैदा कर देती है। नज़ीर के विज़न में कुशादगी पैदा होती है। तो ख़ुरशीद, आफ़ताब, सुब्ह-ए-गुलज़ार, तेशा, पहाड़, बर्क़ वग़ैरा के इस्तिआरे बड़े पुरकशिश बन जाते हैं। महबूब के जमाल का ज़िक्र आता है तो चोटी की गुंधावट, ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ, ग़ुंचा-दहन, रंग-ए-गुल, बोसे का नशा, ज़ुल्फ़ पर शिकन वग़ैरह से इस पैकर की तस्वीर बनाई जाती है। तन की सफ़ाई, तन की नरमी, मख़मल सा पाँव का तलवा,सब्ज़ धानी कुर्ती वग़ैरह उर्दू ग़ज़ल में पहली बार जलवा बनते हैं।“(6)
ख़ुदा के वास्ते गुल को ना मेरे हाथ से लो

मुझे बू आती है इस में किसी बदन की सी
मुझे तो उसपे निहायत ही रशक आता है
कि जिसके हाथ ने पोशाक तेरे तन की सी
देखकर कर कुर्ती गले में सब्ज़ धानी आपकी
धान के भी खेत ने अब आन मानी आपकी
नज़ीर की ग़ज़लों ने उर्दू ग़ज़ल को एक नई तवानाई का एहसास और ख़ुद्दारी अता की। लेकिन इस ख़ुद्दारी की हदें ख़ुद-परस्ती से नहीं मिलती हैं। ये तवानाई और ख़ुद्दारी एक मुतनासिब अंदाज़ और मुतवाज़िन कैफ़ीयत में सेहतमंद ज़िंदगी का सही एहसास दिलाती हैं। उनकी ग़ज़लों में ज़िंदगी से उकताहट और बे-ज़ारी नज़र नहीं आती है। नज़ीर के यहां नाउम्मीदी, मायूसी और ग़मगीनी भी नहीं है। उन्होंने इन चीज़ों पर क़लंदराना तौर पर क़ाबू हासिल किया।
नज़ीर की ग़ज़लों में तसव्वुफ़ पर मबनी अशआर की ख़ासी तादाद मौजूद है। मुख़्तलिफ़ मसाइल-ए-तसव्वुफ़ को बड़ी ही आसान ज़बान में बयान कर देते हैं। नज़ीर की ग़ज़ल का ये शेअर मुलाहिज़ा हो:
उस में क्या ताक़त जो मालिक हो कोई बुत ए नज़ीर
जान भी अल्लाह की और माल भी अल्लाह का
दुनिया की नापायदारी और बे-सबाती के मौज़ू पर नज़ीर के कई अशआर मिलते हैं। ये शेअर मुलाहिज़ा हो:
ना गुल अपना, ना ख़ार अपना, ना ज़ालिम बाग़बाँ अपना
बनाया, आह किस गुलशन में हमने आशयां अपना
हम क्यों ना अपने आपको रो लेवें जीते-जी
ए दोस्त कौन फिर करे मातम फ़क़ीर का
नज़ीर अपनी ग़ज़लों में एक मख़सूस तबक़े की तर्जुमानी करते हैं। जिसकी वजह से उनकी ग़ज़लों में इन्फ़िरादी रंग पैदा हो गया है। नज़ीर के इस इन्फ़िरादी रंग में ग़ज़ल का कोई आला मयार नहीं है। इबादत बरेलवी रक़मतराज़ हैं:
”नज़ीर ने ग़ज़लों के कई दीवान मुरत्तिब किए हैं। और दूसरे ये कि उनमें एक मख़सूस तबक़े की तर्जुमानी की गई है जिसके बाइस उनमें एक मख़सूस इन्फ़िरादी रंग पैदा हो गया है। इस रंग से इख़्तिलाफ़ किया जा सकता है इस को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। ये ठीक है कि नज़ीर की ग़ज़लों के इस मख़सूस रंग में ग़ज़ल का कोई आला मयार नहीं है ना उनमें पेश किए हुए ख़्यालात और जज़्बात-ओ-एहसासात में कोई बुलंदी और निखार है और ना उनमें कोई ग़ज़ल की रवायात को पेश-ए-नज़र रखने की कोशिश की गई है।“(7)
नज़ीर की ग़ज़लों का मुताला करने से अंदाज़ा होता है कि वो ग़रीबों, कमज़ोरों, मुफ़लिसों और निचले तबक़े के लोगों की नुमाइंदगी अपनी ग़ज़लों में करते हैं। वो हर मज़हब व मिल्लत के लोगों से यकसाँ तौर पर हमदर्दाना बरताव पसंद करते थे। प्रोफ़ैसर मुहम्मद हुसैन ने ठीक लिखा है
”वो इलम उल इन्सान से बहुत अच्छी तरह वाक़िफ़ थे। वो हिन्दुओं और मुस्लमानों, बच्चों और बूढ़ों, अमीरों और ग़रीबों, देहातियों और शहरियों, फ़क़ीरों और दुनिया दारों, संतों और ओबाशों सबसे मिलते-जुलते थे।“(8)
बेज़री फ़ाक़ाकशी मुफ़लिसी बे सामानी
हम फ़क़ीरों के भी हाँ कुछ नहीं और सब कुछ है
नज़ीर की नज़्मों की तरह ग़ज़लों में भी अलफ़ाज़ का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा देखने को मिलता है। वो ग़ज़ल में भी जुज़्ज़िआत निगारी में बड़ी क़ुदरत रखते हैं। ग़ज़ल में नज़ीर अकबराबादी ज़ोर-ए-बयान और ज़ख़ीरा-ए-अलफ़ाज़ पर ख़ुसूसी तवज्जा देते हैं। वो ऐसे अलफ़ाज़ भी ग़ज़ल में इस्तिमाल करते हैं, जो आम रिवायत से मुनासबत नहीं रखते। उनकी ग़ज़लों में अलफ़ाज़ का ज़ेर-ओ-बम, नशिस्त-ओ-तर्तीब इक तरन्नुम सा पैदा कर देती है। नज़ीर की ग़ज़ल का शेअर मुलाहिज़ा हो:
दिखा कर झमक दिल को निहायत कर गया बेकल
परी-रू, तुंद-ख़ू, सरकश, हटीला, चुलबुला, चंचल
नज़ीर की ज़बान के मुताल्लिक़ मौलाना अलताफ़ हुसैन हाली कहते हैं कि नज़ीर की ज़बान अहल-ए-ज़बान कम जानते हैं। लिखते हैं
”नज़ीर अकबराबादी ने शायद मीर अनीस से ज़्यादा अलफ़ाज़ इस्तिमाल किए हैं, मगर उनकी ज़बान को अहल-ए-ज़बान कम जानते हैं।“(9)
नज़ीर ने अपनी ग़ज़लों में मुख़्तलिफ़ पकवान का भी ज़िक्र किया है। उनकी ग़ज़लों में ख़ैर, दलिया, वग़ैरह जैसे अलफ़ाज़ देखने को मिलते हैं। एक शेअर मुलाहिज़ा हो:
उधर तो क़र्ज़ हुआ और इधर ना आया यार
पकाई ख़ैर थी क़िस्मत से हो गया दलिया
नज़ीर की ग़ज़लों में नरमी घुलावट शामिल है वो अपनी ग़ज़लों में नरम सुबुक और शीरीं अलफ़ाज़ इस्तिमाल करते हैं और अंदाज़-ए-बयान में रख रखाव पाया जाता है। नज़ीर फ़ारसी अलफ़ाज़-ओ-तराकीब इस्तिमाल करने से गुरेज़ नहीं करते हैं, उनकी ग़ज़लों में फ़ारसी तराकीब और लफ़्ज़ी शान-ओ-शौकत का एहतिमाम है। ग़ज़ल के चंद अशआर मुलाहिज़ा हों:
ए सफ़-ए-मिज़गाँ तकलीफ़ हर तरफ़
देखती है क्या उलट दे सफ़ की सफ़
देख वो गोरा सा मुखड़ा रशक से
पड़ गए हैं माह के मुँह पर कलफ़
आ गया जब बज़्म में वो शोला-रू
शम्मा तो बस हो गई जल कर तलफ़
देखिए क्या हो बेतरह दिल की लगे हैं घात में
अश्वा-ए-पुर फ़रेब भी ग़मज़ा-ए-सेहरकार भी
उर्दू ग़ज़ल को नज़ीर ने एक नया आहंग भी दिया है जिसमें उनके नज़रिया-ए-हयात का बड़ा दख़ल है। बेबाकी और साफ़-गोई उनके मिज़ाज में थी। उनकी ग़ज़लों में भी बेबाकी का जारिहाना अंदाज़ मौजूद है। बेबाकी और बेसाख़तगी के इम्तिज़ाज से तफ़सील और वज़ाहत पैदा हो गई है। इस तफ़सील और वज़ाहत ने उनकी ग़ज़लों में किसी हद तक ढीली ढाली कैफ़ीयत पैदा कर दी है। इस वजह से उनकी ग़ज़लें निखरी हुई नज़र नहीं आती। लेकिन इस के बजाय एक जोश-ओ-वलवले और रिन्दी-ओ-सरमस्ती का एहसास ज़रूर होता है। नज़ीर इस जोश और वलवले, इस रिन्दी और सरमस्ती में इस तरह डूब जाते हैं कि उनके यहां ग़ज़ल की मुरव्वजा रम्ज़ियत और ईमाईयत, रिवायती अलामतें और इस्तिआरे भी नज़रअंदाज हो जाते हैं।
नज़ीर अकबराबादी ने जिस दौर में शायरी शुरू की वो मीर, सौदा और दर्द का ज़माना था इस दौर को उर्दू शायरी का अहद-ए-ज़र्रीं कहा जाता है। सौदा, मीर, और दर्द तो अपने ज़माने के बड़े शायर तस्लीम किए जाते थे। लेकिन जिस शायर ने अपनी ग़ज़लों में पसमांदा तबक़े की तर्जुमानी की उसे नज़र अंदाज कर दिया गया। नज़ीर अकबराबादी की ज़हनी और जज़्बाती तौर पर अवाम से गहरी वाबस्तगी थी। उन्हें अवाम के मज़ाक़, जज़्बात-ओ-एहसासात और मसाइल से दिलचस्पी थी उन्होंने ख़ुद को इन तमाम ख़ुसुसीआत से हम-आहंग कर लिया, जो अवाम में मौजूद थीं, और इन्ही ख़ुसुसीआत की तर्जुमानी वो अपने कलाम में करने लगे। इसी वजह से उनकी शायरी आम रवायत से मुख़्तलिफ़ नज़र आने लगी उन्होंने एक ऐसा रंग इख़्तियार किया जिसमें उनकी इन्फ़िरादियत साफ़ झलकती है।
नज़ीर ने तक़रीबन हर सिनफ़-ए-सुख़न में तब्अ-आज़माई की है। उनके कुल्लियात में ग़ज़ल, नज़म, क़सीदा, मसनवी, रुबाई, मुसद्दस, तर्जीह बंद, मुस्तज़ाद सभी कुछ मौजूद है। ज़िंदगी का कोई पहलू ऐसा नहीं जो उनकी नज़र से चूक गया हो, उन्होंने बेशुमार मौज़ूआत को अपनी तख़लीक़ात में जगह दी है। जिसके नतीजे में उनके यहां अलफ़ाज़ का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा पाया जाता है। नज़ीर ने ग़ज़ल में ज़बान के सही इस्तिमाल की एहमीयत को महसूस किया, लेकिन मौज़ू के एतबार से उन्होंने ज़बान में भी तबदीलीयां की हैं। वो नज़मों की तरह ग़ज़लों में भी अवाम की तर्जुमानी करते हैं, इस लिए बोल की चाल की ज़बान का इस्तिमाल हुआ है। नज़ीर की ग़ज़लों में एक रवानी और बेसाख़तगी है जो मौज़ू से हम-आहंगी का नतीजा है, इस लिए उनकी ग़ज़लिया शायरी में जो जिद्दतें हैं वो ग़ज़ल की क्लासिकी रवायात से पूरी तरह मुताबिक़त नहीं रखतीं बल्कि गहरे जमालियाती शऊर का नतीजा मालूम होती हैं। नज़ीर ने इस एतबार से ग़ज़ल के दायरे को वसीअ किया है और इस में नए इमकानात और नए तजुर्बात के लिए ज़मीन हमवार की है।

٭٭٭

हवाशी:

1          तारीख़ अदब उर्दू (जिल्द अव़्वल) –  वहाब अशर्फ़ी स249
2          बहवाला तारीख़ अदब उर्दू(जिल्द अव़्वल) – वहाब अशर्फ़ी स247
3          कलाम-ए-नज़ीर अकबराबादी – मर्तबा फ़ारूक़ अर्गली स13
4          ग़ज़ल और मुताला-ए-ग़ज़ल – इबादत बरेलवी स304
5          ग़ज़ल और मुताला-ए-ग़ज़ल – इबादत बरेलवी स297
6          नज़ीर अकबराबादी की जमालीयात – शकील-उल-रहमान स79
7          ग़ज़ल और मुताला-ए-ग़ज़ल – इबादत बरेलवी स296-297
8          नज़ीर अकबराबादी हिन्दुस्तानी अदब के मुअम्मार – मुहम्मद हसन स44
9          नज़ीर अकबराबादी की जमालीयात – शकील-उल-रहमान स25

٭٭٭

Dr. Waseem Anwar
Assistant Professor
Department of Urdu & Persian
Dr. H. S. Gour University, Sagar M. P. 470003
[email protected], 09301316075

Last Updated on December 14, 2020 by wsmnwr

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