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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
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श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
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तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लगो : मजरुह सुल्तानपुरी

तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लगो : मजरुह सुल्तानपुरी

 

डॉ. वसीम अनवर

असिस्टेण्ट प्रोफेसर

उर्दू और फ़ारसी विभाग

डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश
[email protected], 09301316075

 

तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लगो शुअरा में मजरुह सुल्तानपुरी एक एहम और मुन्फरिद मुकाम रखने है। उनका असल नाम असरार हसन खाँ था। 1919 ई. में उ. प्र. के गुजहड़ी गांव जिला सुल्तानपुरी में पैदा हुए, इब्तिदाई तालीम अरबी और फ़ारसी में हुई, पेशे से हकीम थे, लेकिन शैर-ओ-शायरी के शौक़ ने पेशा तर्क करने पर मजबूर कर दिया। मुशायरों में शिरकत करते और कलाम के असर और तरन्नुम के जादू से मुशायरे लूट लेते थे। इसी ज़माने में मजरुह को जिगर की सर-परस्ती हासिल हुई। जिगर मुरादाबादी मजरुह के उस्ताद नहीं थे और न ही मजरुह के इब्तिदाई कलाम पर जिगर का कोई ख़ास असर नज़र आता है। जिगर साहेब अपने साथ नौजवान शुअरा को मुशायरों में ले जाते थे। इसी दौरान 1944 ई. में एक मुशायरे में शिरकत के लिए जिगर के साथ मजरुह बम्बई गए और वहीं के होकर रह गए। फ़िल्मी दुनिया से बतौर नग़मा निगार वाबस्ता होकर ग़ैर मामूली शोहरत हासिल की। 24 मई 2000 ई. को बउम्र 81 साल मुम्बई में मजरुह का इंतक़ाल हो गया। मजरुह ख़ालिस ग़ज़लगो शायर हैं। मजरुह का तख़्लीक़ी सफ़र निस्फ़ सदी से ज़्यादा तवील अरसे पर फ़ैला हुआ हैं। लेकिन उनका अदबी सरमाया बहुत ही मुख़्तसिर है। उनकी ग़ज़लों की मजमुई तादाद कम-ओ-बेश पचास होगी। इब्तिदा में उन्होंने कुछ नज़्मे, गीत, नात, मनक़बत और हम्द वग़ैरह में भी तबा आज़्माई की मगर बाद में सिर्फ़ ग़ज़ल को ही अपने इज़्हार का ज़रीअः बनाया। ग़ज़ल मजरुह की मरग़ूब तरीन सिन्फ़-ए-सुख़न थी। इसलिए उन्होने अपने मजमुआ-ए-कलाम का नाम भी ’’ग़ज़ल’’ रखा। जिसके तरमीम-ओ-इज़ाफ़े के बाद तक़रीबन नौ एडीशन शाए हुए और फिर बाद में ’’मशअल-ए-जाँ’’ के नाम से भी शाए हुआ, जिस का निस्फ़ से ज़्यादा हिस्सा ’’ग़ज़ल’’ पर इज़ाफ़े की हैसियत रखता है।

मजरुह इब्तिदा से ही क्लासीकी आईन-ओ-आदाब के क़ाइल रहे हैं। उनके कलाम पर क्लासीकी फ़ारसी रिवायात के असरात बहुत गहरे थे। उनकी इब्तिदाई ग़ज़ले बड़ी पुरलुत्फ़  और    पुराने  तग़ज़्ज़ुल  से  भरपूर  हैं:

इल्तिफ़ात   समझूं   या   बेरुख़ी   कहूँ   इसको

रह  गई  ख़लिश  बनकर  उसकी  कम निगानीभी

इस  नज़र के  उठने  में उस  नज़र के झुकने में

नग़मा-ए-सहर  भी   है    आह  सुबहागाही  भी

कभी जादा-ए-तलब से जो फिरा हूँ दिल शिकस्ता

तेरी  आरज़ू ने हँस  कर  वहीं  डाल  दी  हैं बाँहें

हम  तो  पाए  जाना पर कर भी  आए इक सजदा

सोचती  रही   दुनिया   कुफ्र   है  कह  ईमाँ  है

बचा   लिया   मुझे   तूफ़ाँ  की  मौज  ने वरना

किनारे    वाले    सफ़ीना    मिरा    ड़ुबो   देते

इन अशआर में मजरुह ने तशबीह से कम और इस्तेआरे से ज़्यादा काम लिया है। मजरुह की ग़ज़लों में जमालयाती इन्बिसात के साथ क्लासीकी फ़न्नी लवाज़्मात का भरपूर इल्तिज़ाम मिलता है।

मजरुह की शायरी का इब्तिदाई दौर तरक़्की़ पसंद तेहरीक के उरुज का ज़माना था। मजरुह इस तेहरीक से मुतास्सिर हो कर शामिल हो गए। तरक़्क़ी पसंद शुअरा का आम रुझान नज़्म की तरफ़ था, क्यों कह वो अदब की इफ़ादित पर ज़ोर देते थे। नज़्म के ज़रीए पैग़ाम बराह-ए-रास्त  पहुंचाया  जा  सकता है। ग़ज़ल की ईमाइयत व सिन्फ़ी पाबंदियाँ एक

ठहराओ और ज़बत का तक़ाज़ा करती हैं, इसलिय ग़ज़ल की तरफ़ तवज्जोह नहीं दी गई। लेकिन मजरुह ने ग़ज़ल को अपने इज़्हार का ज़रीअः बनाते हुए ये साबित करने की कोशिश की कह ग़ज़ल में हर तरह के ख़्यालात-ओ-मतालिब का इज़्हार किया जा सकता है। वो हमेशा ग़ज़ल की बक़ा के लिए कोशिश करते हुए तरक़्क़ी पसंदों के ग़ज़ल मुख़ालिफ़ रवैये के खि़लाफ़ सीना सपर रहे। बक़ौल मजरुह सुल्तानपुरीः

’’तरक़्क़ी पसंदों का रवैया उस ग़ज़ल के खि़लाफ़ रद्दे अमल के तौर पर उभरा था जो ज़िन्दगी से अपना रिश्ता खो चुकी थी और जिस में जदीद रवैयों को समोने की सलाहियत ख़त्म हो चुकी थी। इस सूरत-ए-हाल में मैं तन तन्हा तरक़्क़ी पसंद ग़ज़ल के लिए सीना सपर हुआ………… मैं तन्हा था जो उस वक़्त ग़ज़ल की वकालत में डटा हुआ था। ऐसे में फ़ैज़ ने ग़ज़ल की तरफ तवज्जोह की। फ़ैज़ के आने से मेरे नुक्ता-ए-नज़र को ख़ास तक़्वियत हासिल हुई।’’

इस ज़िम्न में प्रो. गोपीचंद नारंग लिखते हैं:

’’मजरुह का कमाल ये है कह न तो उन्होंने तरक़्क़ी पसंदो का साथ छोडा और न ही ग़ज़ल से अपनी वफ़ादारी को तर्क किया। ये उनकी सलामती तबा और खुश मज़ाक़ी का खुला हुआ सबूत है कह उन्हें इस बात का अहसास था कह शेरीयत तग़ज़्ज़ुल उर्दू शायरी का जौहर है और इससे हाथ उठाना गोया शैरियत से मुह मोड़ना है।’’

लिहाजा मजरुह ने समाजी मसावात और इश्तिराकियत का पैग़ाम देते हुए समाजी कशमकश और इंक़िलाब को अपनी ग़ज़लों का मौज़ू बनाकर ग़ज़ल से नज़्म का काम लियाः

लाल  फरैरा  इस  दुनिया  में सबका सहारा  हो के रहेगा

फिरके   रहेगी  धरती   अपनी  देश  हमारा  होके  रहेगा

रूस  का  नौ  संसार  तो  देखो  धरती  श्रृंगार तो देखो।

एक  ज़मीं क्या  लाल  अभी  हर एक सितारा होके रहेगा।

सदियों  से हर ज़ुल्म मिटाते  आए हैं और आजके दिन भी।

जैसे   हम   चाहेगे   साथी  वैसे  गुज़ारा  होके   रहेगा।

अम्न का झण्डा इस धरती पर किसने कहा लहराने न पाए।

ये भी कोई हिटलर का है चेला मारले साथी  जाने न पाए।

मेरी     निगाह   में    है    अर्ज़    मास्को    मजरुह

वो    सर   ज़मीं   कह   सितारे   जिसे   सलाम  करें

एहद -ए- इंक़िलाब   आया   दौर -ए-आफ़ताब   आया

मुन्तज़िर  थीं   ये   आखें    जिसकी   इक  ज़माने  से

मजरुह के ये अशअर इंक़िलाबी ज़ैहनियत की ग़म्माज़ी कर रहे हैं और आसान मैआर के अदब की मिसाल हैं। यहाँ ग़ज़ल और नज़्म का फ़र्क़ बाक़ी नहीं रहा हैः

आ   निकल   के   बाहर   अब  दोरूखी  के   ख़ाने से

काम   चल   नीं    सकता   अब    किसी   बहाने  से

एहल -ए- दिल  उगाऐंगे  ख़ेत  में  मह – ओ – अंजुम

अब   गुहर   सुबक   होगा   एक   जौ  के   दाने  से

मन   चले   बुनेंगे    अब   रंग – ओ – बू के  पैराहन

अब    संवर   के  निकलेगा   हुस्न    कार   खाने से

मजरुह ग़ज़ल के फ़न से बख़ूबी वाक़िफ़ थे। लेकिन इस तरह के अशार नज़्मगो शुअरा के सामने अवामी शायरी बतौर नमूना पेश किये। इसके साथ साथ वो बुलन्द मैआर की तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लें भी कहते रहे जिन में ग़ज़ल का हुस्न मौजूद हैः

दुश्मन की दोस्ती है अब एहल-ए-वतन के साथ

है  अब  खि़ज़ाँ  चमन  में  नए  पैरहन के साथ

सर पर  हवा-ए-ज़ुल्म चले  सौ जतन  के साथ

अपनी  कुलाह  कज  है  इसी  बांकपन के साथ

झौंके  जो  लग  रहे  हैं  नसीम -ए- बहार के

जुम्बिश में है क़फ़स भी असीर-ए-चमन के साथ

देख  ज़िन्दाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार

रक़्स  करना है तो फिर पाँओं की ज़ंजीर न देख

सुतून-ए-दार  पे  रखते  चलो सरों  के चिराग़

जहाँ  तलक  ये  सितम  की  स्याह  रात  चले

मजरुह ने उर्दू ग़ज़ल को एक नए रूख़ से आश्ना किया। उन्होंने ग़ज़ल के मज़ामीन में तौसीअ और आरास्तगी-ए-बयान की मदद से हर क़िस्म के मौज़ूआत को अपनी ग़ज़ल के अस्लूब में ढालने की कोशिश की। उनकी ये ग़ज़लें अस्र-ए-हाज़िर के तक़ाज़ों का साथ देती हुई नज़र आती हैं। क्यों कह वो तरक़्क़ी पसंद ग़ज़ल के लिए असरी अहसास को ज़रूरी ख़्याल करते हैं। चुनाँचह इस ज़िम्न में लिखते हैं:

’’ तरक़्क़ी पसंद तग़ज़्ज़ुल इस के सिवा कुछ नहीं कह

अहसास का  ग़ज़ल की रिवायत में  समोकर  इज़्हार

किया  जाए,  कोई  ऐसा  मौज़ू कोई  ऐसा जज़्बा या

अहसास नहीं है जो तरक़्क़ी पसंद ग़ज़ल में न आया हो’’

मजरुह के यहाँ हज़निया अंदाज़ के बजाए रजाई अंदाज़ मौज्ज़न है। ताज़गी-ओ-तवानाई, अनानीयत, इंसानी अज़मत और खुद एतमादी उनकी ग़ज़लों का ख़ास वस्फ़ है।मजरुह ने क्लासीकी रिवायत के साथ नए मौज़ूआत और नए लब-ओ-लहजे का इज़ाफ़ा किया।

शमा  भी  उजाला भी  मैं ही  अपनी  मेहफ़िल का

मैं  ही  अपनी  मंज़िल  का  राहबर  भी  राही भी

जिस तरफ भी चल पड़े हम आबला पायान-ए-शौक़

ख़ार  से गुल  और  गुल से  गुलिस्ताँ  बनता गया

मैं  अकेला  ही  चला था  जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग  साथ  आते  गए  और  कारवाँ  बनता गया

रोक  सकता  हमें  ज़िन्दान-ए-बला क्या  मजरुह

हम  तो  आवाज़  हैं   दीवार  से  छन  जाते  हैं

मजरुह की ग़ज़ल का लब-ओ-लहजा क्लासीकी है, वो ग़ज़ल की तमाम नज़ाकतों का ख़्याल रखते हैं। तशबीह-ओ-इस्तेआरा और तराकीब के साथ अपने मिज़ाज में रची बसी जमालीयात और सदाक़त-ए-बयान से ग़ज़ल की आराइश करते हैं। मजरुह की ग़ज़ल की फ़न्नी ख़ुसूसीयात बयान करते हुए डॉ मुहम्मद हसन लिखते हैं:

 

 

’’ मजरुह ग़ज़ल में क्लासीकी आईन-ओ-आदाब के क़ाइल हैं। नग़म्गी और मुरक़्क़ा साज़ी उन का फ़न है और इस के लिए साज़-ओ-बर्ग वो रिवायत के सभी नक़्श-ओ-निगार

से हासिल करते हैं। इसी लिए सजावट उनकी ग़ज़लों में मेहज़ तराकीब या तशबीह साज़ी से इबारत नहीं बल्कह सजीलेपन और अल्बेलेपन का नाम है। ’’कहा जाता है कह मजरुह के बाज़ अशआर पर फ़ैज़ के अस्लूब का गुमान होता है। क्योंकह तरक़्क़ी पसंद ग़ज़ल को फै़ज़ अहमद फै़ज़ के साथ इस क़द्र लाज़िम-ओ-मलज़ूम क़रार दिया गया है की मजरुह सुल्तानपुरी पस-ए-पुश्त जाते दिखाई देते हैं। मजरूह और फै़ज़ दानों तरक़्क़ी पसंद तहरीक के एहम शायर हैं। दानों का अदबी मसलक एक है, और लफ़्ज़ीयात-ओ-अलाइम का सरमाया भी काफ़ी हद तक मुश्तरक है। दोनों के यहाँ सियासी रम्ज़ियत नई बुलंदियों के साथ मौजूद है। लेकिन दोनों के लहजों में बैयन फ़र्क़ है। बक़ौल डॉ मुहम्मद हसनः

’’……….मजरूह और फ़ैज़ दोनों के लहजे और दोनों की रम्ज़ियत की नौइयत जुदागाना है। एक तखसीस से तामीम की तरफ़ जाता है और दूसरा तामीम से तखसीस की तरफ़। एक के लहजे में शिकवा है तो दूसरे के हाँ नरमी और दिल बस्तगी। लिहाज़ा इन दोनों में तक़दीम-ओ-ताख़ीर का सवाल ही नहीं पैदा होता है। दानों के लहजे और दायरा-ए-कमाल जुदागाना हैं। दोनों दो अलग तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ के मौज्जिद हैं और शायद ख़तिम भी। ’’

            फ़ैज़ और मजरुह के लहजों का फ़र्क़ दोनों की इन्फ़िरादीयत क़ाईम करता है। मजरुह की ग़ज़ल रिवायत के ख़मीर में ज़्यादा गुंधी हुई है और इस पर मग़रिबी शायरी के असरात न होने के बराबर हैं। जब कह फ़ैज़ के यहाँ क्लासीकी रिवायत के साथ साथ मगरिबी शायरी के असरात भी साफ़ नज़र आते हैं।

            मजरुह सुल्तानपुरी को हमेशा ये शिकायत रही कह उर्दू के नक़्क़ादों ने उनसे बेएतनाई बरती है, और उन्हें वो मुक़ाम नहीं दिया गया जिस के वो मुस्तहिक़ थे।

चंद अशआर मुलाहिज़ा हों:  

ज़ुबाँ  हमारी न  समझा यहाँ  कोई मजरुह

हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे

तुझे न माने कोई तुझको इससे क्या मजरुह

चल  अपनी राह भटकने दे नुकताचीनों को

मजरुह   सुने  कौन   तेरी  तल्ख़  नवाई

गुफ़तार  अज़ीज़ाँ  शकर  आमेज़  बहुत है

            तरक़्क़ी पसंद ग़ज़ल के उरूज का दौर मजरुह की ग़ज़ल गोई के उठान का ज़माना है। इसी दौर में उन्होंने ग़ज़ल में नए तजुर्बे किये और इसको तरक़्क़ी पसंद फिक्र-ओ-नज़र का आईना दार बनाया। 1960 ई. की दहाई तक वो तख़्लीक़ की जिन बुलन्दीयों पर पहुँचे थे बाद में मज़ीद किसी मरहले को उबूर नहीं किया। बाद के ज़माने में मजरुह के सरमाया-ए-ग़ज़ल में बहुत कम इज़ाफ़ा हुआ। उनकी शुहरत का ज़ामिन उनका नैजवानी का कलाम ही है। मजरुह का अदबी सरमाया बहुत मुख़्तसिर ही सही लेकिन उनकी ग़ज़लों का फै़क़-ओ-सुरूर क़ारईन के दिलों को मुतास्सिर-ओ-मुज़्तरिब कर देता है। मजरुह के कुछ मुन्फ़रिद अशआर मुलाहिज़ा हों:

अलग बैठे है फिर भी आँख साक़ी की पड़ी हम पर

अगर  है  तिश्नगी  कामिल  तो  पैमाने भी आयेंगे

अब  सोचते  है  लायेंगे   तुझसा  कहाँ  से  हम

उठने   को    उठ   तो    आए   तिरे   आस्ताँ  से   हम

शब-ए-इंतेज़ार  की  कशमाकश  मे न पूछ  कैसे  सहर हुई

कभी  इक  चिराग़  बुझा  दिया कभी  इक चिराग़ जला दिया

दलीकी  तमन्ना थी  मस्ती  में  मंज़िल  से  भी दूर  निकलते

अपना  भी  कोई  साथी होता  हम  भी  बहकते चलते चलते

जफ़ा   के  ज़िक्र   पे   तुम   क्यों   संभल   के  बैठ  गए

तुम्हारी       बात    नहीं     बात    है     ज़माने    की

तिरे    सिवा    भी    कहीं    थी    पनाह    भूल    गए

निकल   के   हम  तिरी   महफ़िल   से   राह   भूल   गए

मुझे   ये  फ़िक़   सबकी   प्यास   अपनी   प्यास  है  साक़ी

तुझे  ये  ज़िद  कह   ख़ाली   है  मिरा   पैमाना   बरसों  से

मैं  तो  जब  जानूं  कह  भर दे सागर-ए-हर ख़ास-ओ-आम

यूं   तो   जो   आया   वही    पीर-ए-मुग़ाँ   बनता   गया

ये महफिल एहल-ए-दिल है यहाँ हम सब मैकश हम सब साक़ी

तफ़रीक़   करें  इंसानों  में   इस  बज़्म  का  ये  दस्तूर  नहीं

मुझे  सहल  हो  गईं  मंज़िलें  वो  हवा के रूख़ भी बदल गए

तिरा  हाथ हाथ  में  आ  गया  कह  चिगाग़ राह  में जल गए

थामें   उस   बुत  की   कलाई  और   कहें   इसको   जुनूँ

चूमलें      मुँह      और     अंदाज  -ए-  रिन्दाना   कहें

हम    हैं    मिता  -ए- कूचा   -ओ- बाज़ार    की  तरह

उठती      है     हर    निगाह    ख़रीदार    की    तरह

मजरुह   लिख   रहे    हैं   वो   एहल-ए-वफ़ा   का नाम

हम    भी    खड़े    हुए   हैं    गुनाहगार    की    तरह

वो    अगर   बात    न    पूछे   तो  करें  क्या   हम  भी

आप    ही    रूठते    है    आप    ही   मन   जाते  हैं

तक़दीर  का  शिकवा  बेमानी  जीना  ही   तुझे  मंज़ूर  नहीं

आप अपना  मुक़द्दर  बन न सके इतना तो कोई मजबूर नहीं

यही    जहाँ     है   जहन्नुम    यही    जहाँ    फिरदौस

बताओ    आलम  –   ए    – बाला   के   सैरबीनों   को

हम   ही  काबः  हम  ही   बुतख़ाना   हमी   हैं   कायनात

हो  सके  तो  ख़ुद   को  भी   इक   बार  सज़दा  कीजिए

दस्त -ए- मुनइम   मेरी    महनत    का   ख़रीदार   सही

कोई   दिन    और   मैं   रूसवा   सर-ए-बाज़ार    सही

            बहेसियत मजमूई मजरुह मवाद और है हैअत  के मुतनासिब आमेज़ह पर यकीन रखते हैं। उन्होंने एहद-ए-जदीद की एमेजरी और आरास्तगी-ए-बयान के क्लासीकी रचाओ से ग़ज़ल में एक नया मुरक्कब तैयार करने की कोशिश की। उनके यहाँ असरी हिस्सियत, समाजी दर्द-ओ-कर्ब के साथ ताज़गी-ओ तवानाई, खुद एतमादी, इंसानी अज़मत, अनानीयत, एक ख़ास क़िस्म का तेवर, बाँकपन  और  हल्का सा तन्ज़ मौजूद है। जो उन्हें अपने एहद के

दूसरे ग़ज़लगो शौअरा से मुम्ताज़ बनाता है। उन्होंने तरक़्क़ी पसंद रूझानात और माक्र्सी नज़रयात को बड़ी फ़नकारी से तग़ज़्ज़ुल में जज़्ब किया। रिवायत का ख़ास एहतिराम और रिवायत की तौसीअ उनके कलाम का ख़ास वस्फ़ है। मजरुह के मुताल्लिक अख़्तर सईद ख़ाँ की दर्ज ज़ैल राय हर्फ-ए-आखि़र का दर्जा रखती हैः

’’ मजरुह साहब तरक़्क़ी पसंद ग़ज़ल के इमाम थे और तक़रीबन निस्फ़ सदी वो इस मुक़ाम पर फ़ाइज़ थे। उन्होंने तरक़्क़ी पसंद अफ़कार से ग़ज़ल को उस वक़्त आरास्ता किया जब ख़ुद तरक़्क़ी पसंदों की नज़र में ग़ज़ल दर खुरे एतिना नहीं रही थी…………….. तरक़्क़ी पसंद ग़ज़ल मजरुह साहब से मंसूब है और उनकी ये इंफिरादीयत उनकी बक़ा की ज़ामिन है। ’’

 

———————

 

हवाशीः

  1. तरक़्क़ी पसंद अदब पचास साला सफ़र-प्रो. क़मर रईस,

            सैयद आशूर क़ज़मी, सफ़हः – 378

  1. हमारी ज़बान ’’मजरुह सुल्तानपुरी नम्बर,’’ सफ़हः – 11
  2. तरक़्क़ी पसंद अदब पचास साला सफ़र – प्रो. क़मर रईस,

            सैयद आशूर काज़मी, सफ़हः – 490

  1. मुआसिर अदब के पेशरौ – डॉ. मुहम्मद हसन, सफ़हः – 87
  2. मुआसिर अदब के पेशरौ – डॉ. मुहम्मद हसन, सफ़हः – 92
  3. हमारी ज़बान मजरुह सुल्तानपुरी नम्बर, सफ़हः – 12

———————

डॉ. वसीम अनवर

असिस्टेण्ट प्रोफेसर, उर्दू विभाग

डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय,

सागर (म.प्र.)

मो. नं. 09301316075

[email protected]

Last Updated on December 14, 2020 by wsmnwr

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