न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

बेगाना बेगाना लगता है

Spread the love
image_pdfimage_print

हर रातें तो अंधेरी लगती हैं पर

हर सुबह भी धुंधला धुंधला लगता है।

Last Updated on January 22, 2021 by drark23021972

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn

More to explorer

*युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद जी की पुण्य तिथि पर एक कविता*

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱*युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद*(स्वामी विवेकानंद जी के पुण्यतिथि पर समर्पित)**************************************** रचयिता :*डॉ.विनय कुमार

*वैश्विक आध्यात्मिक गुरु-स्वामी विवेकानंद जी की पुण्य तिथि पर एक लेख*

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱*वैश्विक आध्यात्मिक गुरु-स्वामी विवेकानन्द*(पुण्यात्मा स्वामी विवेकानंद जी की पुण्य तिथि पर एक लेख)****************************************  

4 thoughts on “बेगाना बेगाना लगता है”

    1. डॉ आलोक रंजन कुमार

      ग़ज़ल
      डॉ आलोक रंजन कुमार, जपला, पलामू, झारखंड।
      हर रातें तो अंधेरी लगती हैं पर हर सुबह धुंधला धुंधला लगता है ।
      हर नदियां तो कावेरी लगती हैं पर जल कुछ गंदला गंदला लगता है ।
      हर पुराना शख्स अपना लगता है पर कुछ बदला-बदला लगता है ।
      गिरते तो हैं कोई कोई ही शख्स पर हर शख्स सम्हला सम्हला लगता है ।
      अब चमन में फूल तो खिलते हैं पर हर फूल कंटीला कंटीला लगता है ।
      फूल को तोड़ कर रख तो लेते हैं पर हर हाथ चोटिला चोटिला लगता है।
      होली तो अब भी मनाते हैं पर हर रंग खून से नहलाने हरा देता है ।
      दिवाली तो अब भी आते हैं पर हर पटाखा दहला दहला देता है ।
      जिस जिस शहर घूमता हूं हर शहर अब कोरोना कोरोना लगता है।
      नसीब नहीं अब अपने शहर की अपना शहर अब बेगाना बेगाना लगता है।

  1. डॉ आलोक रंजन कुमार

    ग़ज़ल
    डॉ. आलोक रंजन कुमार
    जहां शहर के शहर फूंके जाते हैं सड़कों पर
    वहां रस्मो रिवाज से मय्यत दफन क्या होगा?

    जहां हर रोज के पहनावे से काम चल जाते हैं
    वहां बाद मरने के वास्ते कफन क्या होगा ?

    जहां फलते फूलते बाग रोज ही रौंदे जाते हैं
    वहां झड़ते सूखते किसी चमन का क्या होगा?

    जहां रोज ही बेवजह मौत पे रुदन गाए जाते हैं
    उस देश के किसी शहर में अमन क्या होगा ?

    जहां हर रोज देश के भीतर खंड खंड होते हैं
    उस देश को अभिहित अखंड वतन क्या होगा?

  2. डॉ आलोक रंजन कुमार

    *सिखा दिया है*

    जमाने के गम जो हम सह लेते थे ,
    तुमने उससे लड़ना सिखा दिया है।

    खामोश जो हरदम हम रह लेते थे
    तुमने कुछ कहना सिखा दिया है।

    हम तो तनहाई में रहने लगे थे
    अपने साथ रहना सिखा दिया है।

    हम तो नफरत में जीने लगे थे
    मोहब्बत में रहना सिखा दिया है।

    तुम्हारी मोहब्बत का क्या नाम दूं
    तुमने मुझको जीना सिखा दिया है।

    रोते रहते थे घुट घुट कर हम
    तूने मुझको हंसना सिखा दिया है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!