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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

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डॉ. शैलेश शुक्ला

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सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
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बेगाना बेगाना लगता है

हर रातें तो अंधेरी लगती हैं पर

हर सुबह भी धुंधला धुंधला लगता है।

Last Updated on January 22, 2021 by drark23021972

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3 thoughts on “बेगाना बेगाना लगता है”

    1. डॉ आलोक रंजन कुमार

      ग़ज़ल
      डॉ आलोक रंजन कुमार, जपला, पलामू, झारखंड।
      हर रातें तो अंधेरी लगती हैं पर हर सुबह धुंधला धुंधला लगता है ।
      हर नदियां तो कावेरी लगती हैं पर जल कुछ गंदला गंदला लगता है ।
      हर पुराना शख्स अपना लगता है पर कुछ बदला-बदला लगता है ।
      गिरते तो हैं कोई कोई ही शख्स पर हर शख्स सम्हला सम्हला लगता है ।
      अब चमन में फूल तो खिलते हैं पर हर फूल कंटीला कंटीला लगता है ।
      फूल को तोड़ कर रख तो लेते हैं पर हर हाथ चोटिला चोटिला लगता है।
      होली तो अब भी मनाते हैं पर हर रंग खून से नहलाने हरा देता है ।
      दिवाली तो अब भी आते हैं पर हर पटाखा दहला दहला देता है ।
      जिस जिस शहर घूमता हूं हर शहर अब कोरोना कोरोना लगता है।
      नसीब नहीं अब अपने शहर की अपना शहर अब बेगाना बेगाना लगता है।

  1. डॉ आलोक रंजन कुमार

    ग़ज़ल
    डॉ. आलोक रंजन कुमार
    जहां शहर के शहर फूंके जाते हैं सड़कों पर
    वहां रस्मो रिवाज से मय्यत दफन क्या होगा?

    जहां हर रोज के पहनावे से काम चल जाते हैं
    वहां बाद मरने के वास्ते कफन क्या होगा ?

    जहां फलते फूलते बाग रोज ही रौंदे जाते हैं
    वहां झड़ते सूखते किसी चमन का क्या होगा?

    जहां रोज ही बेवजह मौत पे रुदन गाए जाते हैं
    उस देश के किसी शहर में अमन क्या होगा ?

    जहां हर रोज देश के भीतर खंड खंड होते हैं
    उस देश को अभिहित अखंड वतन क्या होगा?

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