न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

धीरे-धीरे बसंत आ रहा है

 प्रेम का रंग चढ़ रहा है
धीरे-धीरे बसंत आ रहा है
कोयल कूक ने वाली है
संंग हम सब नर-नारी है
जोर जोर से बोलने की
सब कर लिए तैयारी है
तन का मन भंग हो रहा है

      प्रेम का रंग चढ़ रहा है

     धीरे-धीरे बसंत आ रहा है

भंवरों की गुनगुन में 
संगीत लहेरिया मार रही है
फूल की कलियों को खिलते देेख
एहसास हो रहा है मधुपर्क का
छोड़ दो उसे सपने में आज
जो होनेवाले है साकार

प्रेम का रंग चढ़ रहा है
धीरे-धीरे बसंत आ रहा है


नज़रों से कह दो प्यार में
मिलने का मौसम आ रहा है
कंधे पर बांहें डाले
चले जा रहे हैंं अभिसार करने वाले

प्रेेम का रंग चढ़ रहा है
धीरे-धीरे बसंत आ रहा है।

ढोल मजीरा और भांग गुलाल
कृष्ण का रेेेला और फगुआ का मेला
सुबह का बेला और गोपियों का सेना
राधा की गली ओर बड़़े जा रहे हैं।

प्रेेम का रंग चढ़ रहा है
धीरे-धीरे बसंत आ रहा है। ये













 

 

Last Updated on January 13, 2021 by abhijeetbhu17

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बसंत

Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱बसंत  धीरे-धीरे धूप ने, किया शीत का अन्त ।  पुरवाई ने सृष्टि में, छेड़ा राग बसंत ।

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