न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता

सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी
—————————-
जानती हूँ मैं,और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी।
पर व्यक्त करने का तरीका तुम्हारा, शायद अलग है ।

मैं पुरुष नहीं, बदल जाय जो हालात के संग
मैं नारी हूं, जो बदले खुद को हालात के रंग।
जानती हूँ मैं,और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी।
पर व्यक्त करने का तरीका तुम्हारा, शायद अलग है ।

मैं राम नहीं ,ना ही मैं हूँ कृष्णा,
न रावण के जैसी मुझमें मृगतृष्णा।
खुद को मिटाकर तुम्हें बचाऊं
जानती हूँ मैं,और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी।
पर व्यक्त करने का तरीका तुम्हारा, शायद अलग है ।

मैं समय नहीं जो बदल जाए,_
पत्थर भी नहीं जो थम जाए।
सागर हूं,गगरी नहीं जो छलक जाए ,
जानती हूँ मैं,और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी।
पर व्यक्त करने का तरीका तुम्हारा, शायद अलग है ।

भुला सकते हो तुम अपनी खुशी में मुझ को,
हो सकता है याद भी ना आऊँ तुम को।
पर याद करो दुख का कोई एक पल ,
सदा ही साथ खड़ा पाया होगा मुझ को ।
जानती हूँ मैं,और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी।
पर व्यक्त करने का तरीका तुम्हारा, शायद अलग है ।

तुम मेरी फ़िक्र करो, ना करो ,
तुम मेरा ज़िक्र करो, ना करो ।
मेरे रहते घर से बेफिक्र हो तुम।
जानती हूँ मैं,और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी।
पर व्यक्त करने का तरीका तुम्हारा, शायद अलग है ।

चाहे युग वैज्ञानिक हो,
या कोई सा भी युग रहा होगा ।
याद करो मैनें नहीं ,
तुमने ही मुझे छोड़ा होगा ।
जानती हूँ मैं,और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी।
पर व्यक्त करने का तरीका तुम्हारा, शायद अलग है ।

मैं बाहर से कोमल,भीतर से कठोर,
तुम भीतर से कोमल,बाहर से कठोर ।
इक दूजे के पूरक,ना अस्तित्व कहीं और।
जानती हूँ मैं,और भीतर ही भीतर मानते हो तुम भी,
कि सच्ची हितैषी हूँ तुम्हारी।
पर व्यक्त करने का तरीका तुम्हारा, शायद अलग है .

( स्वरचित)

…समिधा नवीन वर्मा 

Last Updated on January 22, 2021 by samidhanaveenvarma

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