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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु रचनाएं

बात होती है जो प्यार में 

 

बात होती है जो प्यार में,

वो नहीं होती तकरार में ।

हो रहा दो दिलों का मिलन ,

  आ रहा लुत्फ़ इस बार में ।

फूल-सा है मुलायम बदन ,

तिल भी चुभता है रुखसार में।

जब सरकती है चिलमन कोई ,

लुत्फ़ आता है दीदार में ।

“दीप “मेरा वो महबूब है ,

छोड़ सकता न मझधार में ।

हवायें गुनगुनाती हैं

                                      

हवायें गुनगुनाती हैं बहारें मुस्कुराती हैं l

कोई आया है परदेशी खबर सखियां सुनाती हैं l

 

नज़र भर देखने की धुन में पागल हो गई आंखें,

मेरे पैरों की पायल भी मिलन के गीत गाती है l

 

पपीहा बोलता है बरगदों की डाल पर बैठा,

गुलाबी चूड़ियां सुन कर खुशी से खनखनाती है l

 

किसी का नाम लिख रखा है मेहंदी से हथेली पर,

जिसे पढ़कर सभी सखियां हकीकत जान जाती हैं l

 

लगा दीवार पे दर्पण दिखाता रूप यौवन का,

हुई मैं ‘दीप’ दीवानी मुझे यादें सताती हैं  l

 

  

                  

     दिल आशिकाना बन जाएगा

दिल मेरा है तन्हा तन्हा, 

कोई फ़साना बन जाएगा l

उनसे नजरें मिलती रहीं तो, 

दिल आशिकाना बन जाएगा l

मेरे अल्फाज़ो में कोई, 

बहर बिठा दो प्यारी-सी,

छेड़ दो दिल से कोई तरन्नुम 

एक तराना बन जाएगा l

 

सारा कुसूर जमाने का था 

  ना थी मेरी कोई खता,

बन जाओ तुम मेरे हमदम 

इक आशियाना बन जाएगा l

 

लब मेरे खामोश है लेकिन

 निकलेगी जिस रोज़ दुआ,

राह के कोई फ़क़ीरों जैसा, 

इक नजराना बन जाएगा  l

 

 फसले-गुल में हमने बुलाया , 

है दीदार की हमको तलब,

गजलों की महफिल है शहर में, 

यही बहाना बन जाएगा l

 

दिल के नशेमन में ये सोचकर 

जगह बनाई थी हमने ,

‘दीप’ किसी दिन अपना भी तो 

हक मालिक़।ना बन जाएगा l

 

दिल निशाना हो गया 

 

आपको देखे बिना हमको ज़माना हो गया ।

छा गई खामोशियां गुमसुम तराना हो गया ।

 

ग़ैर से इम्दाद की उम्मीद कर बैठे हैं हम ,

क्या करें जब कोई अपना ही बेगाना हो गया l

 

इन निगाहों से कोई शिकवा शिकायत क्या करें,

तीर फेंका था कहीं पर दिल निशाना हो गया l

 

उनके आंगन में चमेली खिल उठी है प्यार की ,

खुशबुओं का मेरे घर में आना जाना हो गया l

 

कल ही तो अखबार में निकली मुहब्बत की खबर,

कौन कहता है अभी किस्सा पुराना हो गया l

 

आ गया है ‘दीप’ की राहों में कोई अजनबी,

जब नज़र टकराई तो ये दिल दीवाना हो गया l

 

इज़हार करते रहे 

 हम मुहब्बत का इज़हार करते रहे ।

वो किनारा हर इक बार करते रहे ।

दिल हमारा तड़पता रहा इश्क में ,

वो जमाने से इकरार करते रहे 

वो चले थे किनारे-किनारे मगर,

मेरी कश्ती को मंझधार करते रहे ।

मेरा काँटों से दामन लिपटता रहा,

फूल कलियों से वो प्यार करते रहे ।

रूबरू आने पर था तकल्लुफ उन्हें

मेरा छुप-छुप के दीदार करते रहे ।

दिल दुखाया करते हैं l

 

जिंदगी में ऐसे भी मोड़ आया करते हैं l

दिल लगाने वाले ही दिल दुखाया करते हैं l

 

गर्दिशों के मारों से कौन बात करता है l

दोस्त भी मुसीबत में मुस्कुराया करते हैं l

 

मशविरा तो दे देना पर मदद मती करना l

लोग एहसानों को भूल जाया करते हैं l

 

हम किसी से दुनिया में दुश्मनी नहीं रखते l

लोग जाने क्यों हमको आज़माया करते हैं l

 

‘दीप’ कौन समझाए बेशऊर लोगों को l

 बेवजह की बातों में वक्त जाया करते हैं l

दिल मचलने लगा है 

आँखों में कोई ख्वाब नया पलने लगा है ।

ये दिल मेरा न जाने क्यूँ मचलने लगा है ।

मौसम दरो-दीवार पे लहराता खुशनुमा, 

सावन सुहाना घर में अब ठहरने लगा है ।

बिखरे पड़े थे कांच के टुकडे इधर-उधर, 

ये टूटा आईना भी अब संवरने लगा है।

खामोश कब से झील के पानी में था कंवल,

भँवरे का साथ पाते ही महकने लगा है।

परछाइयाँ मिटने लगीं रंजो-मलाल की, 

अब चाँद ख़यालों में भी चमकने लगा है। 

जज़्बात महकते हैं बहकता है हर कदम,

अफसाना “दीप” कोई नया बनने लगा है ।

वो हमसे मिलता नहीं है 

वो हमसे अब मिलता नहीं है । 

दिल उसके बिन लगता नहीं है ।

एक ग़लतफ़हमी की ज़द में 

प्यार का दिया जलता नहीं है ।

ये पतझड़ की रुत है कैसी, 

गुंचा कोई खिलता नहीं है l

हो जाती है दिल की चोरी ,

कोई शिकायत करता नहीं है l

खेल अजूबे हैं क़िस्मत के ,

ज़ोर किसी का चलता नहीं है ।

उल्फ़त के कंदील में रक्खा,

दीप सुबह तक बुझता नहीं है

हालात क्या कहें 

अंगूर सी आंखों के तिलिस्मात क्या कहें ।

हम इनमें डूब जाने के हालात क्या कहें।

 पल-पल हमारे दिल को सताया है आपने, 

अपनी ज़ुबाँ से इश्क के ज़ज़्बात क्या कहें । 

तारे भी झिलमिलाते रहे, देखते रहे ।

 आंखों ही आंखों में कटी वो रात क्या कहें ।

ज़ुल्फ़ों की अदाओं पे मचलने लगा है दिल, 

दिल की दीवानगी के ख्यालात क्या कहें ।

यादों की क़सक बन गई है दिल का आईना,

हम दीप से उल्फ़त की करामात क्या कहें ।

                                    © रचनाकार 

डॉ. दीप्ति गौड़ “दीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश

सर्वांगीण दक्षता हेतु  राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली की ओर से भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति महामहिम स्व. डॉ. शंकर दयाल शर्मा स्मृति स्वर्ण पदक,विशिष्ट प्रतिभा सम्पन्न शिक्षक के रूप में राज्यपाल अवार्ड से सम्मानित

 

घोषणा पत्र

मै डॉ. दीप्ति गौड़ दीप घोषित करती हूं कि उपर्युक्त समस्त रचनाएं मेरी मौलिक रचनाएं है ।

धन्यवाद्

 

Last Updated on January 20, 2021 by gaurdrdeepti

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