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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु ‘प्रेम आहुति”

प्रेम आहुति

एक दिवस मानस पटल पर,

हर निश्चित रंग अटल पर ।

एक नवीन चित्र उभर कर आया,

जो विस्मित उर को कर लाया ॥

                नदिया के उस ओर किनारे,

                घने पेड़ों की छांव सहारे ।

                गाँव दिखा विस्मित और अद्भुत,

                बिसरा दे जो सुध-बुध ॥

पगडंडी से किया गमन,

देखा अद्भुत एक भवन ।

भव्य दिखे पर पड़ा विरान,

नीरव जैसे हो शमशान ॥

                भवन मध्य में एक साध्वी,

                अलक बिखेरे लगे बावरी ॥

                बैठी तुलस्य पात्र सहारे,

                कुम्लाही सी हाथ पसारे ॥

वहाँ होकर भी वहाँ न होकर,

दूर क्षीतिज भावों में खोकर ।

एक ओर एक टक निहारती,

बैठी है समय बिसारती ॥

                कब प्रातः हुई कब सूर्य उगा,

                कब साझं ढली कब चन्द्र चला ।

                इसे ज्ञात नहीं ये जीवित होकर,

                अनन्त हुई ये सीमित होकर ॥

पवन चले इस भवन मध्य,

चलती है इसकी श्वास भी ।

एक चित्र मानस पर अंकित,

एक इसे विश्वास भी ॥

                एक नाम के पीछे देखो,

                सारा विश्व भुलाया इसने ।

                इससे भी अनजान बेचारी,

                क्या खोया क्या पाया इसने ॥

हुआ परम् सौभाग्य सभी का,

एक सुबह फिर ऐसी आई ।

समस्त प्राणी हर्षित से देखे,

एक अजब हलचल सी छायी॥

                एक सिद्ध योगी महान्,

                उस गाँव के मध्य पधारे ।

                हर प्राणी ने किया वन्दन,

                हर प्राणी ने पैर पखारे ॥

आशीष अनेकों दिए उन्होंने,

समस्त ग्राम का किया भ्रमण ।

सबसे सबकी दुविधा जानी,

सुना सभी से सबका विवरण ॥

                जब गुजरे वो योगी बाबा,

                उस साध्वी के भव्य भवन से ।

                कुछ संदेश पहुँचे बाबा तक,

                उस भवन की दुःखी पवन से ॥

चरण थम गए वही अचानक,

देखा भवन व्याकुल से मन से ।

जोड़ लिए कर दोनों अपने,

श्रद्धा छलकी वहाँ नमन से ॥

                दृष्टि सबकी उठी भवन पर,  

                जागी शंका सबके मन में ।

                बोले बाबा एक बावरी,

                रहती है इस विरह भवन में ॥

यादों में डूबी बेसुध सी,

बैठी रहती है आंगन में ।

आपने किया नमन यहाँ पर,

रहा छिपा क्या श्रद्धेय नमन में ॥

                बाबा रहे मौन मगर,

                मौन भवन में किया प्रवेश ।

                संग चले वो प्राणी सारे,

                जो थे उनके अनुचर विशेष ॥

बाबा बोले अरे साध्वी !

नमन तुझे शतबार मेरा ।

अभी अंकुरित मेरे मन में,

आदर और सम्मान तेरा ॥

                स्वार्थ से अन्धा विश्व सकल ये,

                स्वार्थ से अर्चन करता है ।

हर पल फल की इच्छा लेकर,

देव का पूजन करता है ॥

तू मानव को देव बनाकर,

ध्यान उसी का धरती है ।

प्रेम पुष्प ऐसे अर्पित कर,

हर पल पूजा करती है ॥

तूने जग बिसराया सारा,

तुझे याद वो एक रहा ।

तेरे अन्दर भक्ति का सागर,

आज यहाँ मैं देख रहा ॥

छल और कपट से मुक्ति,

सदा से तूने पाई है ।

तेरी ये अनन्य भक्ति,

तुझे कहाँ ले आई है ॥

निःस्वार्थ ये श्रुद्धा तेरी,

जिसे नमन मैं करता हूँ ।

प्राणियों में जो शंका जागी,

उसे शमन मैं करता हूँ ॥

आराध्य मगर वो तुझको भूला,

जाने क्या वो तेरा त्याग ।

वो लिप्त अपने भोगों में,

तूने वरण किया वैराग ॥

वो आराध्य आराध्य नहीं,

एक मानव साधारण है ।

तेरी ये अन्धी भक्ति ही,

तेरे दुःख का कारण है ॥

वो वह नहीं जो तू समझे,

सकल विश्व ये कहता है ।

तेरी ये भक्ति का सागर,

व्यर्थ उधर को बहता है ॥

चेतन्य हो गई वही साध्वी,

जो अब तक जड़भूत बनी ।

  और उसकी निर्बल वाणी,

उसके भावों की दूत बनी ॥

बोली बाबा मैं निर्बल हूँ,

विवाद नहीं मैं कर सकती ।

आप जैसे विद्वान पुरूष से,

शास्त्रार्थ नहीं मैं कर सकती ॥

पर मेरा प्रश्न एक है,

उत्तर अवश्य देते जाना ।

वरन् मैं श्वासों को त्यागूँ,

पवन सकल लेते जाना ॥

जिस पर मेरा जन्म हुआ,

भारत भूमि कहलाती है ।

यहाँ भक्ति सच्ची हो तो,

अन्धी ही हो जाती है ॥

यहाँ पर पत्थर पूज-पूज कर,

हमने देव बनाए है ।

यहीं पर पत्थर कभी गणेश,

कभी महादेव कहलाए है ॥

मैंने क्या गलत किया गर,

मनु पुत्र को पूजा है ।

मेरा अटल विश्वास वही है,

और नहीं कोई दूजा है ॥

यदि वो आराध्य नहीं बन पाया,

दोष नहीं उसका होगा ।

अवश्य मेरी भक्ति गागर का,

कोण कोई रिसता होगा ॥

अवश्य मेरी पूजा में कोई,

त्रुटी शेष रही होगी ।

सर्वस्य किया अर्पण फिर भी,

कमी विशेष रही होगी ॥

यदि ये मेरा भाव सत्य है,

अवश्य बने वो मेरा देव ।

सिद्ध हो जाएगा स्वतः ही,

मिथ्या कहते थे लोग सदैव ॥

मेरी भक्ति की ये शक्ति,

श्रेष्ठ उसे बना डाले ।

आंधी आये वो भावों की,

पृथ्वी समस्त हिला डाले ॥

पर बाबा में इस जड़ता से,

थकती थकती जाती हूँ ।

पर पथराई आँखो से फिर भी,

रस्ता तकती जाती हूँ ॥

अब वो मानव पुत्र मेरा,

वो देव मेरा उद्धार करे ।

आज अन्तिम आहुति प्राणों की,

मेरी वो स्वीकार करें ॥

निढ़ाल हो गई उसकी काया,

प्राण नहीं अब शेष रहें ।

पलकों पर पुष्प् रूप कुछ,

अश्रु ही अवशेष रहे ॥

छोड़ गई पिंजरे को अपने,

दिव्य प्रकाश में लीन हुई ।

श्रेष्ठतम साधक के पद पर,

पल भर में आसीन हुई ॥

प्रश्न अधूरा छोड़ गई वो,

उत्तर उसे अब देगा कौन ।

हाथ जोड़कर, शीष झुकाकर,

खड़े हुए सब प्राणी मौन ॥

बाबा बोले धन्य साध्वी,

धन्य तेरा वो देव है ।

विश्व की हर पूजा से बढ़कर,

मानव प्रेम सदैव है ॥

Last Updated on January 20, 2021 by drsakshi.sharma87

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