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डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

Uchit pratiyogita ( Basant Utsav )

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——-“अलौकिक भूलोक”——-
पर्वतों की श्रृंखलायें, गान गायें शान का
प्रतीक वनस्पति बृक्षादि हैं, तेरे आत्मसम्मान का I
तूफान शीत बरसात में भी, अडिग रहना धर्म है
प्रदत्त जिनसे जल व फल, निष्कपट इनका कर्म है II
       शरद में उस हिमपतन से, ढकें ये पर्वत श्रेणियाँ
       बसंत ऋतु में ताप से, कटतीं इस हिम की बेड़ियाँ I
       समतलों में लहलहाती, भाजी अन्न की खेतियाँ
       फिर मरुस्थलों की शान है, ये चमचमाती रेतियाँ II
सरितप्रवाह को धन्य है, सबके जीवन संचार हेतु
खिलते प्रसून मिलती सुगन्धि, उऋण न हों आभार हेतु I
प्रकृति की देन है, निज फलती फूलती सभ्यता
अनेक में सब एक हैं, यह आदिकालीन भव्यता II
       त्रिदिशों से घेराव है इस, समुद्रतटीय सीमान्त की
       मध्ये खग मृग गाथा गयें, उल्लेखनीय वेदान्त की I
       आर्यभूमि एक अंश है मित्रो, इस बसुंधरा के अंग का
       फिर क्यों न नाश हो जो उजाड़े, निष्ठुर व पापी दवंग का II
हरित नीला जगमगाता, घूमित संतुलित लोक यह
टिमटिमाता अन्तरिक्ष से, दृष्टिगोचर हो परलोक यह I
अलौकिक आकर्षक सौम्यभूमि, तू सर्व सम्पन्न व ओतप्रोत
केवल कमी है रक्षकों की, भक्षकों का है अथाह स्रोत II
       करते प्रण हैं वचनबद्ध, तिरस्कृत न होने देँगे कभी
       पर्यावरण स्वच्छता सम्पदा पर, ध्यान बाँटेंगे सभी I
       समा जाना है एक दिन सभी को, तेरे ही अन्तःकरण
       जन्म से ही “गज” जीव होता, बसुधे स्वतः तेरी शरण II
———————–गजराज सिंह————————

Last Updated on January 8, 2021 by gajrajsingh2000

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1 thought on “Uchit pratiyogita ( Basant Utsav )”

  1. रचनाकार का नाम : प्रेम लता कोहली
    पदनाम : हिंदी शिक्षक
    ईमेल पता : premlata [email protected]
    संगठन : प्रणेता साहित्य संस्थान
    पूरा डाक पता : हिमालय लोक, जे.वी.टी.एस. गार्डेन नई दिल्ली।
    “अंतरराष्ट्रीय देशभक्ति-काव्य प्रतियोगिता” शीर्षक के तहत 26 जनवरी के लिए मेरी स्व-रचनात्मक भेंट
    गणतंत्र दिवस….
    आज बसंती मौसम में,
    गणतंत्र दिवस आया है।
    धरती की नई छटा में,
    इसने अपना गौरव बढ़ाया है।
    धानी साड़ी रंग-बिरंगे फूलों वाली,
    भारत माँ ने पहनी है।
    शीतळ हवा के झोंकों ने मानों,
    गणतंत्र-स्वागत की ठानी है।
    अखंड भारत की शान निराळी,
    आज राजपथ पर दिखती है।
    फल-फूळों की डाली,खेतों की हरियाली,
    प्रकृति के कण-कण में बिखरी है।
    मनाने त्योहार बसंत और गणतंत्र का,
    मानव और प्रकृति आज सज-धज कर निकले हैं।
    हम आराधना करते हैं माँ सरस्वती की,
    और गुणगान माँ भारती का करते हैं।
    शहीदो को चढ़ा श्रद्धा सुमन,
    हम भारत माँ की आरती करते हैं।……………………… ष्रेम लता

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