न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

“मुझे मेरा वो गाँव याद आता है”

 

 
शीर्षक :- 

             “मुझे मेरा वो गाँव याद आता है”
बरगद की छाँव में
बैठ के बूट्टे खाना,
संग दोस्तों के वहाँ 
घंटों भर बतियाना,
नहीं भुलाये भूलता
वो गुजरा जमाना ,
माँ के डर से छुपके जाना,ठंड में ठिठुरता वो नंगा पाँव याद आता है।
                     मुझे मेरा वो गाँव याद आता है…….
                        सरसों के खेत में
            तितलियों के पीछे भागना,
               धान के ढ़ेर पर लेटकर
                    रात भर वो जागना,
                   बूढ़ी दादी का दूलार
                         वो बसंत बहार,
बरसात के मौसम में उफ़नती नदी का वो तेज बहाव याद आता है।
मुझे मेरा वो गाँव याद आता है……
चेहरों पे होती मुस्कान
लहलहाते खेत-खलिहान,
बैसाखी पे जोश में भरते
   बच्चे, बूढ़े और जवान,
   परिंदों की लंबी कतारें
खिला-खिला नीला आसमान,
मक्की की रोटी सरसों का साग खाने का मेरा वो चाव याद आता है ।
                    मुझे मेरा वो गाँव याद आता है…..
                चौपालों, चौराहों पे
            हुक्कों की गुड़गुड़ाहट,
           मिट्टी से लेपे आँगन में
               रंगोली की सजावट,
                    पगडंडी की सैर
            नन्हें क़दमों की आहट,
जहां गिरा था फ़िसलकर मेंढ पे  मेरा वो घाव याद आता है ।
मुझे मेरा वो गाँव याद आता है…..
      बापू की मीठी घुड़की
मल्लाह का राग अलापना,
   कंधे पे बैठ मेला देखना
            पतंग का उड़ाना
तोतली ज़ुबान में ग़ुब्बारे माँगना,
कैसा हसीं पल था बड़ा सुहाना,
बहन की चोटी खींचकर चिढ़ाने का मेरा वो दाव याद आता है।
                 मुझे मेरा वो गाँव याद आता है……
        सादगी का आलम था चहूँ और
          ना आधुनिकता था कहीं ज़ोर,
          मंद-मंद रौशनी में टिमटिमाते 
                बस तारों का ही था शोर,
         प्रेम-मग्न थे सब अपनी धुन में
               ना ज़ुल्म कोई था ना ज़ोर,
नजरें मिलना, हंसना गुदगुदाना “दीप” तेरा निश्छल सा वो लगाव याद आता है।
मुझे मेरा वो गाँव याद आता है…….!
           *****
कुलदीप दहिया “मरजाणा दीप”
हिसार ( हरियाणा )
संपर्क सूत्र- 9050956788
 
 
 
 
 
 

Last Updated on February 27, 2021 by ddeep935

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