न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

प्रेम-काव्य लेखन प्रतियोगिता

इक अरसा हो गया तुम मुझसे मिले भी नहीं

इक अरसा हो गया तुम मुझसे मिले भी नहीं,
इस बार मिले भी तो तुम कुछ घुले-मिले नहीं,
न जाने ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कभी मिले ही नहीं।2
इक अरसा हो गया तुम मुझसे मिले भी नहीं,
इस बार मिले भी तो तुमने दरम्यान चिन रखी थी,
एक सख्त दीवार,
तुम्हारी आवाज़ भी कुछ फीकी सी लगी,
गले में घुल आयी शक्कर भी कुछ तीखी-सी लगी,
तुम पहली बार बैठे-बैठे थक से गए,
तुम इस बार मिले भी तो अधिक हिले-डुले भी नहीं,
न जाने ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कभी मिले ही नहीं।2
इक अरसा हो गया तुम मुझसे कभी मिले भी नहीं,
इस बार मिले भी तो तुमने जब्त कर रखीं थीं,
हल्क में ख्वाहिशें,
तुम्हारे पास ज़ज्बातों की भी कुछ कमी सी लगी,
आँखों में जज़्ब हो आए ख्वाबों में भी कुछ नमी-सी लगी,
तुम पहली बार भूल गए थे जिद्द करना,
तुम इस बार मिले भी तो अधिक मिले-जुले भी नहीं,
न जाने ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कभी मिले ही नहीं।2
इक अरसा हो गया तुम मुझसे मिले भी नहीं,
इस बार मिले भी तो तुमने पहली बार बाँध रखी थी,
कलाइ पर घड़ी,
तुम्हारे पास वक्त की भी कुछ कमी सी लगी,
दिल की जमीं पर उग आए अरमानों की सांसें भी कुछ थमीं-सी लगीं,
तुम पहली बार भूल गए थे मुझसे उलझना,
तुम इस बार मिले भी तो मुझसे किए शिकवे-गिले भी नहीं,
न जाने ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कभी मिले ही नहीं।2
इक अरसा हो गया तुम मुझसे मिले भी नहीं,
इस बार मिले भी तो तुम कुछ घुले-मिले नहीं।

Last Updated on January 19, 2021 by rajnichanchal10

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