न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

जीवन और मौत में अंतर

         जीवन और मौत का अंतर 

मैंने मौत को बहुत पास देखा, 

हिल गई मेरे जीवन की रेखा, 

वह अद्भुत विलक्षण क्षण ,

सचमुच प्रलयंकारी था,

मुझे आभास करा देता है वह क्षण, 

जीवन की लघुता का,

नश्वरता का, अक्षुण्ण क्षणभंगुरता का,

और प्रणय पाथेय से बिछोह होने का।

 

रूक गयी थी साँसे एक क्षण के लिए,

टूट गए थे सपने भविष्य के लिए,

क्षितिज का धुँधला किनारा ,

बिल्कुल दूर हो चुका था,

जीवन की नाव का किनारा ,

हाथ से निकल चुका था,

कि अचानक सभी प्रश्नों के उत्तर 

मिल गए,

जीवन के अवशेष मौत ने उगल दिए, 

 

अब निश्चित था, 

आज का बीता हुआ क्षण,

प्रभुता की शरण पर अवलंबित था, 

अच्छे कर्मों के बीज का अंकुरण, 

प्रस्फुटित था, 

आस्था, श्रद्धा, भक्ति का गृहीत कवच, 

मानो मेरे नेपथ्य में था।।

 

स्मरण हो आयी पुनः वह, 

स्नेहमयी गोद, 

और वट वृक्ष के समान पितृसाया,

स्मरण हो आयी वह पुनीत सिन्दूर की रेखा,

स्मरित  हो आयीं वह पल्लवित टहनियाँ, 

विस्तृत फल-फूल उस वृक्ष  के,

जिसने मरुभूमि में भी,

अतल गहराई का 

रस सिंचित कराया था।

 

सभी कुछ  अब अनुकूल था, 

प्रतिकूल थी तो केवल स्मृतियों की, 

काली छाया, 

जिसने पुनः एक बार झकझोर दिया, 

अंतस्तल को,

एहसास करा दिया जीवन और मौत के,

असहनीय अंतर को।।

 

_____________________

 

 

 

 

 

 

 

 

Last Updated on January 13, 2021 by drramprakashsrivastava

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn

More to explorer

काशी जाएं की काबा

Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱  पंडित धर्मराज के तीन बेटे हिमाशु ,देवांशु ,प्रियांशु थे तीनो भाईयों में आपसी प्यार और तालमेल

बंटवारा

Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱पंडित महिमा दत्त और लाला गजपति अपने खुराफाती दिमाग से गांव में अपना सिक्का चलाने की कोशिशों

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *