न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

‘बंबई में का बा’ सदी की त्रासदी को बयाँ करता गीत

     बृजेश प्रसाद

‘बंबई में का बा’ डॉ. सागर द्वारा लिखा यह गीत अत्यंत मार्मिक और सशक्त गीत है; जो आज भारत ही नहीं पूरे विश्व में अपनी प्रसिद्धि और सफलता के चरम पर है | पूरी दुनियां में जहाँ भारतीय मानस प्रवासी बनकर गये हैं | यह गीत उन्ही की रोजमर्रा जिंदगी की असलियत को बयां करती है | ‘बंबई में का बा’ यह वाक्य ही लोगों को अपनी माटी की ओर खींचने लगती है | ‘बंबई में का बा’ गीत जिसमें ‘बंबई’ बड़े शहरों का प्रतीक है | जिसका दर्द सिर्फ मुंबई में बसने वालों का दुःख-दर्द नहीं है, बल्कि उन सभी प्रवासियों का दर्द है, जो रोजी-रोटी और बेहत्तर जीवन पाने की कोशिश में अपने देश-समाज और माटी से दूर किसी बड़े शहरों में पलायन किये | इस गीत का शब्द, भाव और अर्थ प्रवासी लोगों को झकझोर कर रख दिया है | यह गीत ऐसी गाथा है जो जीवन की बहुत सी स्मृतियों, भावनाओं और यादों को उकेरती है |

डॉ. सागर बलिया उत्तर-प्रदेश के रहने वाले एक प्रवासी मजदूर के बेटे हैं | वह बचपन से ही प्रवासियों का जो दुःख-दर्द और पीड़ा है उसे महसूस करते आये हैं | प्रवास की कहानी उनके घर पर भी रही है | उनके पिता रोजी-रोटी के लिए हरियाणा में रहते थे | इस पीड़ा को डॉ. सागर और उनका परिवार बहुत करीबी से देखा और महसूस किया | डॉ. सागर की शुरूआती शिक्षा गाँव के सरकारी स्कूल में हुई | उच्च शिक्षा के लिए वह बनारस बी.एच.यू से लेकर भारत के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय दिल्ली तक का सफ़र तय किया | जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से उन्होंने भारतीय भाषा हिंदी अध्ययन केंद्र से एमफ़िल/पीएचडी की उपाधि प्राप्त की | आगे जीवन यापन के लिए उन्होंने तय कर लिया कि अब वे फिल्मों के लिए गीत लिखेंगे और मुंबई शहर में ही करियर को आगे बढ़ाएंगे | धीरे-धीरे सफल भी हुए और उनका पहला गीत श्रेया घोषाल की आवाज में रिकॉर्ड हुआ |

अनुभव सिन्हा अपने ट्विटर पर डॉ. सागर के बारे में लिखते हैं, “He is such a rare talent in Bhojpuri literature. I wonder how, over the past 30 years, he continued to believe that this brand of Bhojpuri writing will some day get mainstream.”1

अपनी रोचक शैली और तुकबंदियों से बेहद गहरी बात को ‘बंबई में का बा’ गीत में इतने चुटकिले और मारक अंदाज में गीतकार डॉ. सागर ने पेश किया है कि उसका हर अंतरा तुरंत जुबान पर चढ़ जाता है और हम सब उसी अंदाज में गुनगुनाने लगते हैं | इस गीत को गाने वाले मशहूर अभिनेता मनोज बाजपेयी और गाने को बनाने वाले निर्देशक अनुभव सिन्हा हैं | यह गीत लोगों में इतना प्रिय हुआ कि तीन-चार दिनों में ही लगभग 50 लाख लोगों ने इसे यूट्यूब पर देखा-सुना |

मनोज बाजपेयी ‘बंबई में का बा’ गीत में छिपे अर्थ की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि माइग्रेंट जो वापस गए, उनकी वह व्यथा, वह दर्द, जिससे वे गुजरे हैं, हमने उसी को बताने की कोशिश की है | हम खुद प्रवासी हैं और हम इस दर्द को समझते हैं | 1000-1500 किलोमीटर पैदल चल पड़ना कोई मामूली बात है..?”2

कोरोना महामारी ने हम सभी से बहुत कुछ छिना | इस दौर में सिर्फ पलायन ही नहीं हुआ | बल्कि इससे जिंदगी के तौर-तरीके भी बदले हैं | जिसे पूरे देशवासियों के जीवन का बहुत बड़ा परिवर्तन कहा जा सकता है | डॉ. सागर जिस क्षेत्र (पूर्वांचल) से आते हैं | उनके आस-पास का भोजपुरी भाषी इलाका ही पलायन का गढ़ है | वे अपनी भाषा में अपने लोगों का दर्द बयान करने में सक्षम गीतकार कहे जा सकते हैं |

डॉ. सागर का कोरोना महामारी के शुरूआती दौर में ही एक गीत पलायन को लेकर रिलीज हुआ था | जिसे सुधाकर स्नेह जी ने गाया और संगीतबद्ध किया था | गीत के बोल में पलायन के दर्द, गाँव-शहर के भेद और विस्थापन की मजबूरी का चित्रण किया गया था  –

“कैसे आई फेरु एही नगरिया हो

डगरिया मसान हो गईल |”3

उत्तर-भारत के प्रवासी मजदूरों की मजबूरियों और भावुक कर देने वाली तकलीफों को बयां करने वाली यह गीत है, कोरोना महामारी के विध्वंस, वीभत्सकारी समय में एक बड़े तबके की घर वापसी करने की है | जिसमें डॉ. सागर ने पलायन की क्रोध को सवाल के रूप में अपने गीत में प्रयुक्त किया है | प्रवासियों को यह लगता है कि उनके लिये सबसे ज्यादा सुरक्षित जगह उनका अपना गाँव-समाज है | जहाँ वे खुश रह सकते हैं | लेकिन दो वक्त की रोटी और परिवार का पालन-पोषण के लिए अपनी जन्मभूमि को छोड़ बड़े शहरों की ओर पलायन करते हैं | प्रवासी मजदूरों का यह मानना है कि उन्हें अपने राज्य-जिला-जवार में काम मिल जाता तो वह अपनी मेहनत से उसे स्वर्ग बना देते |

‘बंबई में का बा’ गीत उत्तर-भारत के लोक जीवन में रची-बसी मार्मिक संवेदनाओं को बखूबी स्वर दिया है | इस गीत ने न केवल उन सभी मजदूरों की तकलीफों को परत दर परत खोल कर रख दिया है बल्कि यह भी समझने का मौका दिया है कि न केवल बंबई बल्कि दिल्ली, पंजाब, कोलकाता, गुजरात हरियाणा में भी प्रवासी मजदूरों के पास, परिवार की रोजी-रोटी के लिए मजबूरी में रहने के सिवाय वहां उनके लिए कुछ नहीं रखा | इस हालत में भी मजदूर इसलिए रह रहे हैं कि उनके अपने गाँव-देहात में रोजी-रोटी कमाने के संसाधन और संभानाएं मौजूद नहीं है –

“जिनगी हम त जियल चाहीं

खेत बगइचा बारी में

छोड़छाड़ सब आइल बानी

हम इहवां लाचारी में

काम काज ना गाँव में बाटे

मिलत नाहीं नोकरिया हो

ना त बंबई में का बा? इहवां का बा ?”4

‘ना त बंबई में का बा’ में महानगरों के दबेनुमा कमरे में छटपटाते प्रवासियों का बिम्ब शायद सागर के बचपन और करियर का भोगा हुआ यथार्थ है | आज भी शहरों का लगभग 60 प्रतिशत एरिया प्रवासियों का ‘स्लम’ एरिया के अंर्तगत आता है | जहाँ वह रह रहे हैं वहां सुविधा या व्यवस्था है ही नहीं | न तो जरूरत भर पानी मिलती न ही अन्य जरूरतों की चीज़े | लेकिन लोग मजबूर और विवस हैं वहां रहने के लिए –

“दू बिगहा में घर बा लेकिन

सुतल बानी टेम्पू में

जिनगी ईअंझुराइल बाटे

नून तेल आ सेम्पू में |”5

डॉ. सागर देश की व्यवस्था और सरकार की नीतियों को देख कौंध जाते हैं | आजादी के इतने सालों बाद भी देश में विकास की रफ़्तार धीमी दिखाई पड़ रही है | मसलन जिस तरह से आज समाज का बहुत बड़ा तबका अपने ही देश में एक राज्य से दूसरे राज्य में विस्थापन के लिए बाध्य हो रहा है | वह अत्यंत दयनीय और चिंताजनक है | डॉ. सागर के यहाँ इस दर्द को बखूबी देखा जा सकता है –

“गाँव सहर के बिचवा में हम

गजबे कन्फ्यूजिआइल बानी

दू जून की रोटी खातिर

बाम्बे में हम आइल बानी

ना त बंबई में का बा? इहवां का बा ?”6

कमलेश वर्मा लिखते हैं, “मदन कश्यप, श्रीप्रकाश शुक्ल, राकेश ‘कबीर’, बोधिसत्व, संजय कुंदन, पंकज चौधरी आदि कवियों ने इस दौर में श्रमजीवी वर्ग की वेदनाओं की जो तस्वीरे खिंची थी | उन सबका मानो ‘संचित प्रतिबिम्ब’ सागर के इस गीत में दिखाई देता है |”7

मजदूर आज मजबूर नहीं है | वे तो हमारी विरासत के वे सच्चे धरोहर है | आज उन्हें बचाना हमारे देश-समाज के लोगों का कर्तव्य होना चाहिए | डॉ. सागर द्वारा लिखा इस गीत में वह सामाजिक-दृष्टि है, जो अपने दौर की राजनीतिक परिघटनाओं की बहुत सख्ती से छानबीन करती है | वह अपने गीत में भारी संख्या में मजदूरों के पलायन को एक प्रश्न और वेदना के साथ प्रस्तुत करते हैं –

“काम धाम रोजगार रहित त

गंउवे स्वर्ग बनइतीं जा

जिला जवारी छोडिके इहवाँ

ठोकर काँहे खइती जा

कईसे केहू दुखवा बांटे

हम केतना मजबूर हईं

लरिका फरिका मेहरारू से

एक बरिस से दूर हईं |”8

आजाद भारत की बागडोर पूंजीवादी ताकतों के हाथों आई | वही दलितों-पिछड़ों और असहाय लोगों ने शारीरिक मेहनत से जीवन बिताने को मजबूर हुए | इन्हीं मजदूरों के खून-पसीने और मेहनत से राष्ट्र का निर्माण होता है | लेकिन कथाकथित वर्गों में बंटा हुआ भारतीय समाज जाति-धर्म और अर्थ के आधार पर लगातार मजदूरों का शोषण करता आया है | ‘बंबई में का बा’ यह गीत न केवल मजदूरों की पीड़ा को दिखाती है बल्कि जाति-धर्म के नाम पर शहरों में किस तरह प्रवासी मजदूरों को जाति-धर्म का द्वंस झेलना पड़ता है, उसे भी प्रस्तुत करती है –

“एक समाज में देख केतना

ऊँच-नीच के भेद हवे

उनका खातिर संविधान में

ना कौनो अनुच्छेद हवे |

जुलुम होत बा हमनी संगवा

केतना अब बरदास करीं

देस के बड़का हाकिम लो पर

अब कईसे बिस्वास करीं |”9

युवा कवि डॉ. राकेश ‘कबीर’ लिखते हैं, – “पलायन और ऊँच नीच के भेदभाव, विकास में क्षेत्रीय असामनता, घर परिवार से दूर रहने की मजबूरी, गाँव-ज्वार, खेती-बारी, बाटी-चोखा सब कुछ समेटकर अद्भुत रैप गीत लिखने वाले डॉ. सागर अत्यंत समर्थ गीतकार हैं | उनके सीने में अपने क्षेत्र और लोगों से जो मोहब्बत और दर्द है, उससे आगे और भी बेहतरीन गीत निकलेंगे |”10

विस्थापित लोगों ने अपनी पूरी उम्र शहर के बेगानेपन को अनुभव किया है | वे हर विपरीत परिस्थितियों में अपने घर लौटने को बेताब रहते हैं | मसलन जब वे अपने जीवन का अतीत, वर्तमान और भविष्य की समृद्धि के बारे में सोचते तो व्याकुल हो उठते | प्रवासी दुनियां में लोगों के अन्दर कितनी बैचनी है | इस गीत में देखा जा सकता है | ढलते उम्र में घर-समाज-परिवार की यादें गहरी होती जाती है | डॉ. सागर अपनी गीत में इस प्रसंग का भी ज़िक्र करते हैं | वे लिखते हैं  –

“बूढ़ पुरनिया माई बाबू

ताल तलैया छूट गईल

केकरा से देखलाई मनवा

भितरे-भितरे टूट गईल

ना त बंबई में का बा? इहवां का बा?”11

इस तरह यह पूरा गीत कमाल के सवालों से भरा हुआ है | कोरोना महामारी में विस्थापित जनता जरूर अपने आप को इस गीत से रिलेट कर पा रही होगी | सवालों के इसी नियम कानून में गीत आगे बढ़ता है और गाँव में स्कूल, शिक्षा, अस्पताल, व्यवस्था और बच्चों के भविष्य पर भी बात होने लगती है | यह बातचीत स्वाभिमान, उम्मीद, विश्वास अपने राज्यों में संसाधनों की कमी सहित सभी सवालों पर होती है –

“बेटा बेटी लेके गाँवे

जिनगी जियल मोहाल हवे

ना निम्मन इस्कूल कहीं बा

नाही अस्पताल हवे |”12

डॉ. सागर अपने इस गीत में प्रवासी जीवन के लगभग सभी द्वंद्वों को रखने का प्रयास किया है | एक बाप के लिए अपने बच्चो से रोजी-रोटी के लिए दूर रहना कितना पीड़ादायक और मार्मिक है, उक्त पंक्तियों में देखा जा सकता है | एक पिता अपनी बेटी को अंकवार और गोद में भर लेने के लिए कितना व्याकुल और बेताब है –

“ऐ बाँबी…आउ ना..गोदिया में आउ ना

अरे इहाँ सूत ना

गोदिया में सूत जो |”13

इस तरह देखा जा सकता है कि पूरे गीत में उत्तर-भारत के लोग जो दशकों से प्रवासी बनकर बाहर रह रहे हैं | उनके दुःख-दर्द को बयां किया गया है | उनके लिए यह गीत झुमने के साथ-साथ उन्हें घर-गाँव की याद को भी गहराई से भर देती है | प्रवासी जीवन-यापन की स्थिति को बयां करते हुए डॉ. सागर लिखते हैं –

“घीव दूध माखन मिसरी

मिलेला हमरा गाँवे में

लेकिन इहवां काम चलत बा

खाली भजिया पावे में

एतना मुवल जियला पर भी

फूटल कौड़ी मिलत ना

लौना लकड़ी खर्ची बर्ची

घर के कमवा जूरत ना |”14

युवा नेता चिराग पासवान ट्विट करते हुए लिखते हैं, “दू जून रोटी खातिर बंबई में आइल बानी | मुख्य रूप से बिहार के पलायनों के दर्द को भोजपुरी रैप के माध्यम से खुबसूरत ढंग से पेश किया गया है |”15

कहा जा सकता है कि बहुत दिनों बाद सर्वहारा मजदूर और प्रवासी जीवन की तकलीफ को आवाज देने वाला एक संवेदनशील फ़िल्मी गीतकार दिखाई पड़ा है | जिसके गीत प्रवासी जीवन के साथ ही कोरोना काल में लाखों मजदूरों की असलियत को दिखाता है | जो मजबूरन ही कोरोना काल में पैदल घर की तरफ निकल पड़े, जिसमें हजारों की संख्या मजदूर भूख, गर्मी, थकान, और प्यास से मारे गये |

डॉ. सागर द्वारा लिखा गया ‘बंबई में का बा’ गीत में अनुभव सिन्हा जैसे शानदार निर्देशक और उसके गीतकार मनोज बाजपेयी ने जिस तरह से इंसानी मजबूरियों, जज्बातों, बेवसी-लाचारी को उघड़ने की शानदार कोशिश की है | उसे ज़माने तक लोगों के बीच याद रखा जायेगा |

अंततः हिंदी के कवियों ने कोरोना काल में जो अपनी साहित्यिक जिम्मेदारी पूरी की उसका सुमेलित लोक प्रसारित चित्र रूप ‘बंबई में का बा’ गीत बनती हुई प्रतीत होती है | डॉ. सागर का मानना भी है कि, “यह गीत अश्लीलता के खिलाफ एक अभियान है |”16 

 

संदर्भ ग्रंथ सूची –

  1. https://twitter.com/anubhavsinha?ref_src=twsrc%5Egoogle%7Ctwcamp%5Eserp%7Ctwgr%5Eauthor
  2. https://youtu.be/koJwuVtJmr0
  3. https://youtu.be/koJwuVtJmr0
  4. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10213636861794577&id=1794870211
  5. वही,
  6. वही,
  7. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3209595155822294&id=100003155221773
  8. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10213636861794577&id=1794870211
  9. वही
  10. डॉ. राकेश ‘कबीर’ से बातचीत : डॉ. सागर
  11. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10213636861794577&id=1794870211
  12. वही ,
  13. वही ,
  14. वही ,
  15. https://twitter.com/ichiragpaswan?lang=en
  16. डॉ. सागर से कविता के संदर्भ में फोन पर बातचीत

 

Last Updated on January 4, 2021 by srijanaustralia

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn

More to explorer

*प्रेम मिलन की ऋतु आयी है वासंती*

Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱*प्रेम मिलन की ऋतु आयी है वासंती************************************ रचयिता : *डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव*वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.

*संघर्षों में लड़ने से ही मिलती है सदा सफलता*

Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱*संघर्षो में लड़ने से ही मिलती है सदा सफलता***************************************** रचयिता :*डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.

प्यार

Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱प्यार बड़ा-छोटा काला-गोरामोटा-पतलाअमीर-गरीबहर किसी को हो सकता है-किसी से प्यार ,यह ना माने सरहदें, ना देखे दरो-दीवार,हंसी-बदसूरत,बुढ़ा-जवान,तंदरूस्त-बीमार,यहाँ

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *