न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

आँगन में खेलते बच्चे

आँगन में खेलते बच्चे

आँगन में खेलते रंग-बिरंगे बच्चे,
लगते कितने प्यारे कितने अच्छे !
फूलों-सी मुस्कान है-चेहरों पर
और आँखों में भरे-सपने सच्चे ।

खेलते छुपन-छुपाई, पकड़म-पकड़ाई,
गोपी चंदर ने इनकी ख़ुशी बढ़ाई;
भले ही हाथ-पाँव, कपड़े माटी से सने,
फिर भी मज़े से बाँटकर खाते चने ।

हँसना-रोना, शोर मचाते जाना,
किसी को चिढ़ाकर घर में घुस जाना,
गिरकर संभलना- हर्ष भर देता है;
यही सब तो खेल का अंग होता है ।

इन्हें बाहर खेलता देख सूरज भी
अपनी तपिश कुछ कम कर देता है,
पवन का हरेक शीतल झोंका
इनके उत्साह को दुगना कर देता है ।

चुपके से खेतों में घूमने जाना,
छिपकर आम-अमरूद तोड़कर खाना,
गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचाना ,
अपने आप में कितना सुख देता है !

इनकी मासूम शरारतों को देख
इन्हें, अंक में लेने को जी करता है,
इनकी अजब बाल लीलाओं को निरख,
सहसा नंदकिशोर स्मर्ण हो उठता है ।

मोटी-मोटी किताबों में मत खोने दो,
दुकानों-फैक्ट्रियों पर मत जाने दो,
यूँही आँगन में खेलते लगते अच्छे-
ये रंग-बिरंगे प्यारे-प्यारे बच्चे ।

ये अभी है-माटी के घड़े कच्चे,
ना छिने,कोई इनका सुनहरा बचपन
चूंकि इन्हें ही बदलना है देश को;
ये हीं बनेंगे देश के सेवक सच्चे ।

आँगन में खेलते रंग-बिरंगे बच्चे,
लगते कितने प्यारे कितने अच्छे !
फूलों-सी मुस्कान है-चेहरों पर
और आँखों में भरे-सपने सच्चे ।

संदीप कटारिया (करनाल, हरियाणा)

Last Updated on May 12, 2021 by sandeepk62643

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