न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

काशी जाएं की काबा

 

पंडित धर्मराज के तीन बेटे हिमाशु ,देवांशु ,प्रियांशु थे तीनो भाईयों में आपसी प्यार और तालमेल था पूरे गाँव वाले पंडित जी के बेटो के गुणों संस्कारो का बखान करते नहीं थकते पंडित जी के पास एक अदद झोपडी कि तरह घर था खेती बारी भी नहीं थी पंडित जी के परिवार कि परिवरिस आकाश बृत्ति से चलती थी पंडित जी के यजमानो के दान दक्षिणा से परिवार का भरण पोषण होता ।पंडित के बच्चे भी पंडित जी के पुश्तैनी कार्य में हाथ बटाते पंडित जी ने अपने बेटों को बचपन से ही पांडित्य कर्म कि शिक्षा दी थी पंडित धर्मराज जी कि गृहस्थी बड़े आराम से गुजर रही थी।पंडित जी के गांव में लगभग सौ परिवार मुस्लिम समाज का रहता था गांव का माहौल बहुत ही सौहादरपूर्ण था हिन्दू मुस्लिम सभी एक दूसरे के सुख दुःख में सम्मिलित होते आपस में क़ोई धार्मिक या जातीय भेद भाव नहीं था गाँव को लोग अमन चैन भाई चारे के नजीर के रूप में मानते ।पंडित जी का भी परिवार इस गाव कि शान था आर्थिक सम्पन्नता बहुत अधिक नहीं थी फिर भी पंडित जी के रसूख में क़ोई कमी नहीं थी।धीरे धीरे समय बीतता गया पंडित जी के तीनों बच्चे जवान हो चुके थे बड़े बेटे हिमांशु का विवाह हो गया और परिवार में एक सदस्य संख्या बढ़ गयी आमदनी सिमित थी और खर्ज बढ़ गया देवांशु को परिवार कि आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा था सरकारी नौकरी तो मीलने वाली नहीं थी अतः उसने योग कि शिक्षा प्राप्त कि और पहले गाँव पर ही लोगो को इकठ्ठा कर योग शिविर लगाने लगा धीरे धीरे जब गांव वालों को योग से अनेको बीमारियों से लाभ हुआ और लोग स्वस्थ होने लगे तब हिमांशु की ख्याति एक दक्ष योग गुरु के रूप में होने लगी और आमदनी होने लगी कुछ दिनों बाद हिमांशु को एक अवसर शहर में योग शिविर लगाने का प्राप्त हुआ संयोग से उस शिविर में पोलेंड के मिस्टर ट्राम अपने कुछ मित्रों के साथ आये थे वे सभी हिमासु के योग कला से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने हिमासु को पोलैंड आने का निमंत्रण दे दिया ।हिमांशु लगभग एक वर्ष बाद पोलेंड गया वहाँ उसे पोलेंड वासियों ने हाथो हाथ उठा लिया हिमांशु वहां दिन रात तरक्की कि सीड़ी चड़ता जा रहा था फिर उसने अपनी पत्नी को भी वहां बुला लिया और पूर्ण रूप से पोलेंड वासी हो गया।पंडित जी का दूसरा बेटा दिव्यांसु मुंबई में अंतरराष्ट्रीय बड़ी कंपनी में इज़्ज़त और रसूक के पद पर कार्यरत था वैसे तो पंडित जी के दो बेटो ने पंडित जी का नाम बहुत रौशन किया लेकिन दोनों बेटे दूर थे और क़ोई ख़ास आर्थिक मदद नहीं करते पंडित जी ने सोचा कि तीसरे बेटे को कही नहीं जाने देंगे और उसे पुश्तैनी कार्य पांडित्य कर्म में लगा देते है हिमांशु और देवांशु तो दूर न चुके थे अब पंडित धर्म राज और उनकी पत्नी सत्या और तीसरा बेटा प्रियांसु तक परिवार सिमट गया था प्रियांशु यजमानो के बुलावे पर उनके मांगलिक कार्य संपन्न करता दिन धीरे धीरे गुजर रहे थे कि एक दिन प्रियांसु शाम को किसी यजमान के यहाँ से लौट रहा था रास्ते में देखा कि बहुत ही खूबसूरत खोडसी सड़क के किनारे कराह रही थी प्रियांशु उसके नजदीक पंहुचा तो देखा कि लड़की के सर से खून का रिसाव हो रहा है प्रियांशु जल्दी जल्दी उसे अपने कंधे पर लादा अपनी सायकिल वही छोड़ दी और लगभग दो किलोमीटर पैदल चल कर प्राथमिक स्वस्थ केंद्र मोती चक ले गया जहा ड़ॉ तौकीस ने उसका तुरंत उपचार प्रारम्भ किया और पूरी रात निगरानी में रखने को कहा प्रियांशु तो आफत में फंस गया क्योकि उसके माँ बाप परेशान होंगे मरता क्या न करता वह मन मार कर उस अनजान लड़की कि देखभाल कर रहा था रात के लगभग बारह बजे रात को उस लड़की को होश आया तब प्रियांशु ने पूछा तुम्हारा नाम क्या है तरन्नुम लड़की ने बताया प्रियांशु ने पूछा किस गाँव कि रहने वाली हो लड़की ने बताया बंगाई प्रियांशु ने कहा बगाई तो मेरा गाव भी है मगर मैंने तुम्हे कभी नहीं देखा लड़की ने बताया वह मुसलमान हूँ और खलील कि बेटी हूँ इधर पंडित धर्मराज और सत्या प्रियांशु के घर न आने के कारण चिंतित थे सुबह के पांच बजने वाले थे डा तौकिश ने प्रियांशु से कहा अब आप इसे ले जा सकते है फिर डा तौकीस ने कहा बैसे आपकी ये लड़की क्या लगाती है जोड़ी खुदा के करम से बहुत शानदार खूबसूरत है खुदा तुम दोनों को सलामत रखे प्रियंशु बिना कुछ बोले डा तौकीस का धन्यबाद ज्ञापित किया और तरन्नुम को साथ लेकर प्राथमिक स्वतः केंद्र से बाहर निकाला सौभाग्य से एक तांगा बंगाई गाँव जा रहा था प्रियांशु ने तरन्नुम को उस पर बैठा दिया और किराया देता बोला क़ि इन्हें छोड़ देना जहाँ से ये आसानी से घर पहुँच सके।प्रियांशु पैदल चला और जहाँ पिछले शाम अपनी सायकिल छोड़ कर गया था वहां पंहुचा वहां उसकी सयकील सुरक्षित पडी थी सायकिल लिया और घर चल पड़ा थोड़ी देर बाद घर पहुंचा तब माँ सत्या और पिता धर्मराज ने विलम्ब का कारण पूछा प्रियांशु ने बड़ी ईमानदारी से पूरी घटना बता दिया ।पंडित धर्मराज ने पूछा मुसलमान कि लड़की को छुआ तू अपवित्र हो गया है जा जल्दी से स्नान करो मैं पंचगव्य बनाता हु जिससे तुम पवित्र हो सकोगे प्रियांशु ने स्नान किया और पञ्च गव्य वैदिक रीती स ग्रहण कर पवित्र हुआ।
प्रियांशु इस घटना को भूल चुका था
लेकिन तरन्नुम प्रियांशु को नहीं भूल पायी वह कोइ न कोई बहाना खोज लेती और प्रियांशु को छेड़ती प्रियांशु तरन्नुम से दूर भगता क्योकि पिता धर्मराज का डर उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था एक बार पंचगव्य से शुद्ध होकर दुबारा अशुद्ध नहीं होना चाहता था तरन्नुम कि शोखियों शरारते उसके मन को झकझोरती फिर भी वह दूरी बनाये रखता एक दिन तरन्नुम ने अपनी शरारतो में कह ही दिया पोंगा पंडित यह बात प्रियांशु को ज्यादा संजीदा कर गयी अब वह तरन्नुम के शरारतो को निमंत्रित करता इसी तरह धीरे धीरे दोनों में प्यार हो गया और दोनों के प्यार कि बात गांव में घर घर चर्चा का विषय बन गयी।जब इसकी जानकारी दोनों के परिवारो में हुई तो पूरे गाँव का माहौल तनाव पूर्ण हो गया और अमन प्यार का गांव नफ़रत के जंग का मैदान बन गया।
गाँव में एक तरफ हिन्दू और दूसरी तरफ मुसलमान आपस में कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे किन्तु कुछ हिन्दू विद्वानों और कुछ मुस्लिम विद्वानों ने सर्व सम्मति से यह निर्णय दिया कि प्रियांशु और तरन्नुम गांव छोड़कर चले जाय क्योकि पंडित धर्मराज के यजमानो का कहना था कि आपका बेटा धर्म भ्रष्ठ हो चुका है और उसे ब्राह्मण समाज में रहने का कोइ हक नहीं है उधर मुस्लिम समाज ने कहा तरन्नुम ने एक काफ़िर से मोहब्बत करने कि जरुरत कि है अतः उसे इस्लाम में रहने का हक नहीं है।
इसी बीच तरन्नुम ने प्रियांशु का हाथ पकड़ा और दोनों सम्प्रदाय के मध्य जाकर खड़ी शेरनी कि तरह दहाड़ मारती उसने अपने हाथ और प्रियांशु के हाथ कि हथेली पर चाक़ू से गहरा घाव बना दिया दोनों के हथेलियों से खून बहने लगा तब तरन्नुम ने दोनों सम्प्रदायो के लोगो से सवाल किया अब बताओ किसका खून इस्लाम का है किसका खून हिन्दू का है जब अल्लाह खुदा भगवान् ने सिर्फ इंसान बनाया तब तुम लोग कौमो और फिरको में बाँट कर नफरत क्यों फैलाते हो ।दोनों सम्प्रदाय के लोग आवाक रह गए फिर तरन्नुम ने ही सवाल किया बताओ हम दोनों कहाँ जाये काबा या काशी।
दोनों ने एक दूसरे का हाथ थामा और गांव छोड़कर चले गए दोनों और मुम्बई पहुच गए तरन्नुम कपड़ो कि सिलाई करती और प्रियांशु मजदूरी करता खली समय में दोनों पड़ते कहते है न कि जब सारे रास्ते बंद हो जाते है तो नई मंजिल कि उड़ान का रास्ता खुल जाता है करीब दस सालो के कठोर परिश्रम से तरन्नुम का चयन भारतीय प्रसाशनिक सेवा में हुआ और प्रियांशु का भारतीय पुलिस सेवा में दोनों कि नियुक्ति उनके राज्य में ही हुई ।आज उनके गॉव के हिन्दू मुस्लिम दोनों संप्रदाय के लोग फक्र से कहते है तरन्नुम और प्रियांशु उनके गाव के अभिमान है।

———-कहानीकार– —- नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश

Last Updated on March 1, 2021 by nandlalmanitripathi

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn

More to explorer

क्षणिकाएँ (विडम्बना)

Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱(1)झबुआ की झोंपड़ी परबुलडोजर चल रहे हैंसेठ जी कीनई कोठी जोबन रही है।** (2)बयान, नारे, वादेदेने को

वज़ूद

Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱#वज़ूद इस कायनात में अगर कुछ हैतो वो सिर्फ “वज़ूद”अगर वो है तो ये सारी दुनियाँ तुम्हारे

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *