न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

पूरे रोहतकी स्वाद लिए है ‘कांटेलाल एंड संस ‘

Spread the love
image_pdfimage_print

सुशील कुमार ‘नवीन’

न्यूं कै दीदे पाड़कै देखण लाग रहया सै, इसा मारूंगी दोनूं आंख बोतल के ढक्कन ज्यूं लिकड़कै पड़ ज्यांगी। आया म्हारा गाम्म का …ला। किसे मामलै ने उलझाकै राखण की मेरी बाण ना सै, हाथ की हाथ सलटा दिया करूं। या हरियाणा रोडवेज की बस ना सै कै अंगोछा धरते सीट तेरी हो ज्यागी, या मेरी सीट सै। बैठना तो दूर इस कानी लखाय भी ना, तो मार-मार कै मोर बना दयूंगी। मीची आंख्या आलै, आडै कै तेरी बुआ कै ब्याह म्ह आया था। घणा डीसी ना पाकै,इसा मारूंगी सारी मरोड़ कान्ध कै चिप ज्यागी। तेरे जिसे म्हारी भैंस चराया करैं, आया बिना नाड़ का चौधरी। चाल्या जा, आज तेरा भला बख्त सै, जै मेरा संतोषी माता का बरत ना होता ना, तै तेरी सारी रड़क काढ़ देती….।

चकराइये मत। दिक्कत वाली कोई बात नहीं है। दिल और दिमाग दोनों दुरस्त हैं। सोचा आज आपको स्वाद का नया कलेवर भेंट कर दूं। रोज-रोज आम का अचार खाकर बोरियत हो ही जाती है। बीच-बीच में तीखी मिर्च के आस्वादन की बात ही कुछ और होती है। ठेठ हरियाणवी बोली और वो भी रोहतकी। तीखी मिर्च से कम थोड़े ही न है। सुनने वाले के सिर में यदि झनझनाहट ही ना हो तो फिर इसका क्या फायदा। 

  ठीक इसी तरह का स्वाद लिए सब टीवी पर एक नया सीरियल सोमवार से शुरू हुआ है ‘कांटेलाल एन्ड संस’। पूरी तरह से रोहतकी कलेवर के रंग में रंगे इस सीरियल की शुरुआत प्रभावी दिखी है। हरियाणवी को किसी सीरियल या फ़िल्म में सही रूप में बनाए रखना सरल कार्य नहीं है। और यदि इसमें रोहतक को प्रमुख केंद्र बना दिया तो गले में रस्सी बांधकर कुएं में लटकने जैसा है। ‘एक रोहतकी सौ कौतकी’ ऐसे ही थोड़े ना कहा जाता है। इनके मुख से निकला हर शब्द ‘ब्रह्मास्त्र’ होता है, वार खाली जाता ही नहीं। एक रोहतकी के शब्दों के बाणों का मुकाबला दूसरा रोहतकी ही कर सकता है और कोई नहीं। दिल्ली से रोहतक होकर गुजरने वाली बसों और ट्रेनों में बैठे यात्री रोहतक जाने के बाद ऐसा महसूस करते हैं जैसे कई महीनों की जेल से पीछा छूटा हो।

   आग्गै नै मर ले, आडै तेरी बुआ का लोग (फूफा) बैठेगा। 50 रपिये दर्जन केले तेरी मां का लोग (पिता) खरीदेगा, परे न तेरी बेबे का लोग(जीजा) 40 रपिये दर्जन देण लाग रहया सै। ओए दस रपिया की दाल म्हारे कानी भी करिए, नींबू निचोड़ दे इसमै, इननै कै घर के बाहर टांगण खातर ल्या रहया सै। ओ रे कंडेक्टर, एक टिकट सांपले तांईं की दे दे,कै कहया बाइपास जाग्गी, भीतरनै कै थारे बुड़कै भर लेंगे। तड़के आइए फेर बतावांगे। और कंडक्टर भी रोहतक का मिला तो पूरी बस का मनोरंजन फ्री हो जाता है। खिड़की कानी होले, ना तै रोहतक जाकै गेरूँगा, फेर या मरोड़ झोले म्ह लिए हांडे जाइये। बस ड्राइवर भी रोहतक का मिल जाये तो फिर क्या कहने। दो-चार डायलॉग लगे हाथ वो भी मार जाएगा। आ ज्यां सै, तड़के तड़क सुल्फा पीकै। या बस थारे  बटेऊ की ना सै,कै जड़े चाहो ब्रेक लगवा ल्यो। इब तो या रोहतक भी बाइपास जाग्गी। जो किम्मे करणा हो वा करलियो। सतबीरे, मारदे लाम्बी सीटी।

कहने की बात ये है कि हास्य का अलग ही अंदाज लिए होते हैं रोहतकी बोल। गाली भी इस तरह दे जाते हैं कि सामने वाला महसूस करके भी चुप्पी साधना भलाई समझता है। तो ‘कांटेलाल एंड संस’ हरियाणवीं रंग को कितना बरकरार रख पाएगा, ये तो समय ही बताएगा। पर सुशीला, गरिमा के साथ छोटे भाई घनश्याम की तिकड़ी की हरकतों पर ठहाके लगना पक्का है।शब्दों का सही फ्लो और डायलॉग डिलीवरी यूँ ही बनी रही तो टीआरपी शिखर छूते देर नहीं लगेगी। 

(नोट-लेख मात्र मनोरंजन के लिए है। इसे व्यक्तिगत न लेकर जनसाधारण के रूप में रसास्वादन करें)

लेखक: 

सुशील कुमार ‘नवीन’

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद है।

96717-26237

PHOTO: GOOGLE

Last Updated on November 23, 2020 by dmrekharani

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn

More to explorer

थर्ड जेंडर

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱  तुम क्या कहोगे मुझे?  पहचान के लिए एक अदना सा शब्द तो दे

सौ सौ अफसाने हैं

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱नवगीत सबका अपना तौर-तरीकासबके अपने पैमाने हैं। हैं कई सभ्यताएँऔर उनमें संघर्ष है।कैसे होगा

अफलातून लगा है

Spread the love

Spread the love Print 🖨 PDF 📄 eBook 📱22 22 22 22ग़ज़ल वह तो अफलातून लगा है।पशुता गर नाखून लगा है।। भ्रष्टाचार

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!