न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

भाषा विज्ञान और अनुवाद विज्ञान की समस्या

भाषा विज्ञान और अनुवाद विज्ञान की समस्या        

प्रस्तावना –
अनुवाद एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक भाषा के विचार, भावों, बिंबो, और अर्थच्छवियों को दूसरी भाषा में व्यक्त किया जाता है। अनुवाद करते समय भाषा की मूलकृति का कथ्य और षिल्प को सुरक्षित रखकर लक्ष्य भाषा में अवतरित करना होता है। सीधे शब्दों में कहे तो ‘‘किसी भाषा में कही या लिखी गई बात का किसी दूसरी भाषा में सार्थक परिवर्तन अनुवाद (ज्तंदेसंजपवद) कहलाता है।’’1 यानी अनुवादक को अनुवाद करते समय मुल भाषा और स्त्रोत भाषा दोनों का ज्ञान होना आवष्यक है। इसी कारण अनुवाद का सीधा संबंध भाषा के विज्ञान से अर्थात भाषा विज्ञान से होता है।
’विज्ञान’ शब्द का सामान्य अर्थ है ‘‘विषिष्ट ज्ञान’’ । यानी भाषा के सभी अंगों का अध्ययन-विष्लेषण कर तत्वों या नियमों को प्रतिपादीत करना ही भाषा विज्ञान है। भाषा अपने विचारों को व्यक्त करने का एक सषक्त माध्यम है। भाषा की अनुभूति एकसी हो सकती है पर उसकी अभिव्यक्ती अलग-अलग होती है। अभिव्यक्ती के वैभिन्य के कारण ही अनुवाद की आवष्यकता पडती है। डाॅ. भोलानाथ तिवारी का भी कहना है कि – ’’एक भाषा में व्यक्त विचारों की व्यक्त भावों एवं विचारों को लख्य भाषा मे तथा संभव अपने मूल रुपमे लाने का प्रयास करता है। ’’2  ’अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ यानी अंग्रेजी में ’एप्लाइड लिंग्युस्टिक’ कहते है उसके अंतर्गत भाषाविज्ञान के अनुप्रयोग के रुप में रुपायित किया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि अनुवाद में भाषाविज्ञान के सिध्दांतो का अनुप्रयोग होता है। हर भाषा की अपनी अपनी व्यवस्था होती है और वही भाषा को नियंत्रित करती है। जैसे हिंदी में दो लिंग है, तो संस्कृत भाषा में तीन लिंग है। अंग्रेजी में ’त्ंउ हवमेए ेममजं हवमेष् है तो इसमें ’गोज’ यह शब्द कर्ता के लिंग से अप्रभावित है। तो हिंदी में उलटा है उदाहरण के लिए ’राम जाता है,’ ’सीता जाती है।’ यानी यहाॅ क्रिया को कर्ता के अनुरुप रखना होता है। इस प्रकार भाषाविज्ञान और अनुवाद का परस्पर सीधा संबंध है।
अनुवाद मूलतः दो भाषाओं की तुलना पर आधारित है। यानी तुलनात्मक भाषा विज्ञान को सिद्धांतों के आधारपर दोनोें लक्ष्य भाषा और स्त्रोत भाषा की जितनी सामग्री उपलब्ध होगी उतना ही अनुवाद अच्छा होगा। भाषाविज्ञान की जो मुख्य छः शाखाये है ध्वनि, रुप, शब्द, वाक्य, अर्थ, लिपि तो उसका सीधा संबध्ंा अनुवाद से आता है। उसे हम निम्न प्रकार से देख सकते है।
1.     अनुवाद और ध्वनि-विज्ञान:-
ध्वनि-विज्ञान भाषाविज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा मानी जाती है। ध्वनि विज्ञान ध्वनि का स्थान निष्चित करता है। कई बार अनुवाद करते समय भाषा व्यवस्था के कारन हमें ध्वनि को ध्वन्यानुकूल करना पडता है। उदाहरणार्थ अगर हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद कर रहे है तो ष्स्वदकवदष् का उच्चारण हिंदी में ‘लंदन’ होगा। फ्रेंच ’क्मचवजष् को हिंदी में ‘डिपो’ कहेंगे। इस का मुल कारण है कि इस प्रकार का उच्चारण हिंदी भाषा की ध्वनि-पकृति के अनुरुप है। इस प्रकार को अनेक शब्द हम देख सकते है। जैसे – ।तपेजवजसम.अरस्तू, ैवबतंजमेम. सुकरात, ज्ीवउवे.टाॅमस, ।बंकमउल . अकादमी आदी। अगर भाषा ध्वनि प्रकृति के अनुरुप अनुवाद नहीं किया गया तो वह भाषा के प्रतिकूल होगा। इसीकारण अनुवादक को ‘ध्वनि-विज्ञान’ का ज्ञान होना आवष्यक है। इस प्रकार ध्वनि-विज्ञान का अनुवाद कार्य में विषेष महत्व है।
2.    अनुवाद और रुपविज्ञान:-
रुपविज्ञान का अनुवाद से सीधा संबंध है क्योंकी अनुवाद करते समय स्त्रोत भाषा रुपों के रुप या रुप समुच्चयों को रखा जाता हैं। जब कोई शब्द वाक्य में प्रयुक्त किया जाता है तब उसे ‘पद’ या ‘रुप’ कहा जाता है। रुप विज्ञान में शब्दों की संरचना कैसी होती है, अक्षरों से रुप किस प्रकार निर्मित होते है आदि बातों का अध्ययन किया जाता है। अनुवाद में स्त्रोत भाषा की शब्दसंपदा के लिए लक्ष्य भाषा के शब्दों का व्यवहार किया जाता है। प्रत्येक भाषा की रुप रचना भिन्न भिन्न होती है। इसी कारण अनुवाद में दो प्रकार की मुख्य समस्याएॅ निर्माण होती है।
1. शब्दरुप का अंतर        2. शब्द वर्ग
1.    शब्दरुप का अंतर –
अधिकांष भाषाओं में संज्ञा, क्रिया, विष्ेाषण, संबंध वाचक कृदन्त होते है। किंतु कुछ ऐसी भाषाएॅं है जिनमें संज्ञा के स्थानपर क्रियावाची शब्दों का प्रयोग करना पडता है। जैसे – ‘मेजाटेक’ भाषा में ’स्वअमष् क्रिया है। ‘तारा हुमरा’ भाषा में छोटा, बुरा, लंबा आदि शब्द रुप विशेषन न होकर क्रियाएॅ। है।
2.    शब्दवर्ग –
शब्दों के विषेष रुपों से विषिष्ट अर्थ का बोध होता है। सामान्यतः भाषा में रुपरचना के नियम होते हैं। किंतु इसमें अपवाद भी मिलते है। इन अपवादों की और अनुवादक को ध्यान देना आवष्यक है। अंग्रेजी का विचार करे तो अंग्रेजी में बहुवचन बनाने के लिए ष्ेष्ए ष्मदष्ए ष्पमेष्ए का उपयोग किया जाता है। जैसे ठवल.ठवलेए ळपतस.ळपतसेए वग.वगमदए बवनदजतल.बवनदजतपमे तो इसी में कुछ ऐसे शब्द है जिसका बहुवचन होता ही नहीं है। जैसे –  ेीममच.ेीममचए कममत.कममत आदी। हिंदी में अकारांत पुलिंग के रुप में ‘ए, ओ, औ को जोडा जाता है। उदा. घोडा-घोडें, घोडों। कुछ अपवादात्मक शब्द भी है जिनमें ‘पिता,’ ’देवता’, ’राजा’ आदी।

3.     अनुवाद और वाक्यविज्ञान –
हर भाषा में वाक्य विज्ञान को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। वाक्य विज्ञान में वाक्यरचना का अध्ययन किया जाता है। अतःयहाॅ अनुवाद के लिए वाक्यविज्ञान का महत्व स्वतःसिध्द हो जाता है। वर्तमानकालीन समय में शब्द या शब्दस्तर से अधिक वाक्य स्तर को महत्वपूर्ण माना है। शाब्दिक अनुवाद की अपेक्षा वाक्य स्तर पर किया गया अनुवाद अधिक स्तरीय दिखाई देता है। इसिलिए अनुवादक को भाषा की वाक्यरचना या वाक्यव्यवस्था के व्यावहारिकता से परिचित होना चाहिए। भाषा की संरचनात्मक एवं व्यावहारिक प्रकृति को ध्यान में रखना आवष्यक है। अनुवादक को निम्नलिखित मद्दों पर ध्यान देना आवष्यक है।
1.    वाक्य की बाह्य एवं अंातरिक संरचना –
वाक्य के बाह्य और आंतरिक संरचना दोनों की और अनुवादक को खास देना जरुरी है। क्युंकी कुछ ऐसे वाक्य होते है जिनमें बाह्य और आंतरिक संरचना में कोई भेद नहीं होता। उदा. ’में पुस्तक पढ रहा हूॅ।’ इसके विपरीत संरचना में भेद मिलनेवाले वाक्य भी होते है। जैसे – ’वह पढनेवाला है।’ इसके अनेक अर्थ निकलते है कि वह अभी पढनेवाला है। दूसरा उसका स्वभाव पढने का है।
2.    वाक्यों के निकटस्थ अवयव –
वाक्यों में एक या एक से अधिक अवयव होते हैं । जो पद या अवयव कहलाते है। उदा. रा’म पुस्तक पढता है।’ में तिन निकटस्थ अवयव है। अनुवाक को सभी अवयवों की और ध्यान देना आवष्यक है। उदा. प् तमंक ळममजंूंसपए ज्ञंअपजंूंसपए टपदंलचंजतपांए ंदक त्ंउबींतपज डंदंे व िज्नसेपकंे ण् इसका एक अनुवाद – मैंने गीतावली, कवितावली, विनयपत्रिका और तुलसीदास का रामचरित मानस पढा। (अषुध्द अनुवाद) जबकी दुसरा सही अनुवाद होगा। मैंने तुलसीदास की गीतावली, कवितावली, विनयपत्रिका और रामचरित मानस पढा।
3.    प्रयोगविधी –
इसका अर्थ है कि किसी आषय को व्यक्त करने की रीति है। भाषा में एक शब्द विषेष के साथ विषेष अर्थो में सभी शब्दों का प्रयोग नहीं होता। अनेक पर्यायी शब्द प्रयुक्त होते है उसमें से यथायोग्य शब्द को चुनना होता है। जैसे अंग्रेजी में ’ब्रेक फास्ट’ के लिए हिंदी में जलपान शब्द प्रयुक्त होता है। जल के लिए अनेक पर्यायवाची शब्द है- नीर, पानी । यहाॅ अगर जलपान के स्थानपर अगर हम ’पानीपान’ या ’नीरपान’ कहेंगे तो यह प्रयोग गलत होगा। उदा. ’वह सोने के लिए घर गया।’ उसका अनुवाद भ्म ूमदज ीवउ वित ेसममचपदह   ;अषुध्द  द्ध भ्म ूमदज ीवउम जव ेसममच ;षुध्द द्ध
4.    लिंग –
कुछ भाषाओं में व्याकरणिक ढाॅंचे से देखे तो दो लिंग है। कुछ भाषा में तीन है तो अन्य तुर्की, फारसी, उनबेक, आदी भाषाओं में लिंग हैं ही नहीं।
अंग्रेजी में स्त्रींिलंग –  ेीपचए उववदए ेचतपदह ये सभी शब्द हिंदी में पुल्लिंग शब्द है।
हिंदी में स्त्रीलिंग – मौत, जाडा, वही शब्द अंग्रेजी में पुल्लिंग है जैसे क्मंजीए ॅपदजमत
यहाॅ कहना यही है कि अनुवादक को स्त्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा दोनों के लिंगो का ज्ञान अपेक्षित है।
5.    वचन –
प्रत्येक भाषा के वचन संबंधी अपने-अपने नियम होते है। अनुवादक को सतर्कता बरतनी चाहिए। अंग्रेजी में कुछ ऐसे शब्द है जिनके एकवचन और बहुवचन में कोई अंतर नहीं है। जैसे ेीममचए कममतण्
6.    पुरुष –
अधिकांष भाषा में तीन पुरुष मिलते है। प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष और अन्य पुरुष। अनुवादक को लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुसार अनुवाद करना आवष्यक है। उदा. ’मोहन ने कहा कि में नहीं आउॅंगा।’ का अनुवाद डवींद ेंपक जींज प् ूपसस दवज हव ;अषुध्द  द्ध डवींद ेंपक जींज ीम ूपसस दवज हव ;षुध्द द्ध
7.    कारक चिह्न –
भाषाओं के अनुसार कारक में भी भिन्नता होती है। संस्कृत भाषा में 7, हिंदी में 8 तो लैटिन आदि भाषाओं में 5, अंग्रेजी में 2 ही मिलते कारक मिलते है। अनुवाद करते समय कारकों में परिवर्तन करना पडता है। जैसे भ्म पे हवपदह जव चनदंण्  का अनुवाद ’वह मुंबई को जा रहा है’ नहीं होगा। यहाॅ कारक ’को’ का प्रयोग नहिं किया जाना चाहिए। सिर्फ वह ’मुबई जा रहा है। ’
8.    काल –
अनुवाद करते समय काल की और भी ध्यान देना आवष्यक है। जैसे हिंदी में जाता है और जा रहा है के स्थान पर संस्कृत में ’गच्छती’ का ही प्रयोग होता है।
9.    पदक्रम:-
हर भाषा का अपना पदक्रम होता है। जैसे मराठी और हिंदी में कर्ता, कर्म और क्रिया होता है। तो अंग्रेजी में कर्ता, क्रिया और कर्म होता है। जैसे ’’मैंने और सोहा नें पुस्तक पढी।’’ का अनुवाद प् ंदक ेवीं तमंक जीम इववा गलत होगा ताकि डवींद ंदक प् तमंक जीम इववा अनुवाद सही होगा।
10.    जोडना और छोडना-
भाषा प्रकृति के अनुरुप कई बार लक्ष्य भाषा में अनुवाद करते समय कुछ जोडना तो कुछ घटाना भी पडता है।
जोडना – ठमजजमत संजम जींद दमअमत दृ कभी न पहॅंचने से देर से पहॅंचना अच्छा है।
छोडना- भ्म पे बवउपदह इंबा .  वह लौट रहा है।

4.    अनुवाद और अर्थविज्ञान –
अनुवाद की मुख्य समस्या यही होती है कि मुल पाठ का भाव स्त्रोत भाषा में वैसा ही आए जैसा मूल पाठ में है। अर्थविज्ञान का संबंध भाषा के अर्थ -पक्ष से होता है। प्रत्येक भाषा के आषय का विषिष्ट अर्थ होता है। अतः केवल शाब्दिक अर्थ को नहीं बल्कि अर्थ के साथ अनुवाद होना आवष्यक है। अर्थअनुवाद करते समय कुछ तथ्यों की और ध्यान देना आवष्यक है। जैसे-
    काल– ’आकाषवाणी’ शब्द पहले देववाणी के लिए प्रयुक्त होता था किंतु आज रेडिाओ का पर्यायी शब्द बन गया है।
    स्थान -भेदः– स्थानभेद से अर्थ का विपर्यय हो सकता है। भोजपूरी शब्द ’चलता-पुरजा’ शब्द व्यवहार कुषल के रुप में प्रयुक्त होता है तो वहीं दिल्ली में ’धूर्त’ के रुप में प्रयोग होता है। इसका ध्यान अनुवादक को रखना आवष्यक है।
    संदर्भ – अर्थ का निर्धारण संदर्भ पर निर्भर होता है। क्योंकी एक ही शब्द के अनेक अर्थ हो सकते है। आवष्यकता यह है कि पहले उसका संदर्भ जान ले। जैसे ’हरि’ शब्द के अनेक अर्थ होते है -ईष्वर, विष्णु, बंदर आदी
    शब्द-षक्ति – शब्द-षक्ति के तिन प्रकार होते है। अभिधा, लक्षणा, व्यंजना। अनुवाद को ध्यान रखना है कि वाक्य में कौनसी शब्द-षक्ति का प्रयोग किया गया है। जैसे ’ वह बैल है।’ यहाॅ बैल का अर्थ प्राणी न होकर मूर्खता का सूचक है।
    पर्यायवाची शब्द – अनुवाद करते समय योग्य पर्यायवाची शब्द का चुनाव करना आवष्यक है। समुद्र शब्द के लिए जलनिधि, तयोनिधि, उदधि, पयोधि आदी शब्द है। इसीकारण अनुवादक को समरुपता मूलक शब्द का प्रयोग करना चाहिए।
सांस्कृतिक आधार – सांस्कृतिक महत्व वाले शब्दांे की और अनुवादक को ध्यान देना चाहिए। उदा. के लिए अंग्रेजी हीवेचमस जतनजी का अनुवाद ’गोस्पल में विर्णत सत्य न करके वेद वाक्य इस प्रकार करना चाहिए।
इस सब के साथ ही अनुवाद में शैली को भी महत्वपूर्ण स्थान है। भाषा की शैली अनुवाद में क्या स्थान रखती है इस संबंध में छपकं का मानना है कि –        श्ज्तंदेसंजपदह बवदेपेजे पद चतवकनबपदह पद जीम तमबचमजमत संदहनंहमण् ज्ीम बपवेमेज दंजनतंस मुनपअंसमदज जव जीम उमेेंहम व िजीम ेवनतबम संदहनंहम पितेज पद उपंदपदह ंदक ेमबवदक पद ेजलसमण्श् 3

निष्कर्ष –
सारांषतः हम यह कह सकते है कि अनुवादक को भाषाविज्ञान के उपयुक्त सभी अंगों का अध्ययन करना चाहिए या उसका ज्ञान होना चाहिए। तभी अनुवाद सटिक और संप्रेषणीय हो सकता है। भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है। वर्तमान समय में वेब मेडिया, संचार क्रांती, बाजारवाद, वैष्वीकरण आदी के कारण विभिन्न देषों में आपसी कारोबार बढ रहा है। विदेषी उत्पादन हमारे यहाॅ आ रहे है। उसका विज्ञापन भाषांतरण के बिना संभव नहीं है। इसप्रकार अब अनुवाद हमारे संवाद की भाषा बन गया है। साहित्य के साथ साथ समाज के हर क्षेत्र में अनुवाद की उपादेयता सिद्ध हुई है। बस अनुवाद करते समय भाषाविज्ञान के तत्वों का ध्यान रखकर अनुवाद होना चाहिए।

Last Updated on November 3, 2020 by abhisharma.spn

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