न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

खोपड़ी

 

ठाकुर सतपाल सिंह का स्मारक बन चुका था अब लाला गजपति और पंडित महिमा दत्त के पास गांव वालों में किसी नए विचार की फसाद का कोई अवसर नही था फिर भी दोनों को चैन इसलिये नही था कि गांव में कोई समस्या नही थी ।शोमारू प्रधान ने ठाकुर सतपाल सिंह के स्मारक से कुछ ही दूरी पर प्राइमरी स्कूल के लिए जमीन दे दी थी जिस पर स्कूल बन चुका था और बच्चों के पठन पाठन का कार्य चल रहा था।गांव वालों को भी चैन था कि ठाकुर सतपाल सिंह के स्मारक के लिये गांव के दो लोंगो की बलि चढ़ गई एक तो चौधरी सुरेमन प्रधान बेवजह बेगुनाह सजा काट रहे थे और मुसई बेमौत मरा गया गांव वालों को इतनी कुर्बानी के बाद भी शांति मंजूर थी।समय अपनी गति से चल रहा था पंडित महिमा दत्त जिस मानव खोपड़ी को गांव की नदी के रेता से उठाकर लाये थे उसे उन्होंने छुपा कर अपने व्यक्तिगत कमरे में रख दिया था और प्रतिदिन एक बार कमरा खोल कर उस मानव खोपड़ी को सुरक्षित है कि नही देख लिया करते समय बीत रहा था।सोमारू प्रधान पंडित महिमा दत्त और लाला ग़ज़पति की हर बात को अपना नैतिक कर्तव्य मानकर मानता जा रहा था गांव वालों को भी निश्चिंतता थी कि अब कोई ऐसा कारण नही है जिससे कि पंडित महिमा और लाला ग़ज़पति को नागवार लगे और नया बखेड़ा शुरू हो अमूमन गांव वालों ने दोनों पर ध्यान देना बंद कर दिया ।लाला ग़ज़पति और पंडित महिमा लाला शोमारू प्रधान तक सीमित रह गए जिससे गांव वालों का कोई लेना देना नही था।गांव में नौजवानों की नई पौध नए विचारों के साथ नए समय परिवेश में चल आ चुकी थी ।एकाएक लाला ग़ज़पति ने पंडित महिमा दत्त से कहा पंडित आज कल एक बात गौर किया पंडित सब समझते जानते हुए भी मित्र से अनजान बनते पूछा क्या ?लाला ग़ज़पति ने माथे पर बल देते हुये कहा पंडित आज कल गांव वाले हम लोगो को तवज्वो नही देते अब हम लोग गुजरे जमाने के जीते जागते लोग रह गए है जिनकी कोई अहमियत नही है।पंडित महिमा दत्त ने भी सहमती से सर हिलाते हुए कहा सही कह रहे हो लाला अब हम लोग गुजरे वक्त के शेर रह गए है जो आज के समय मे ढेर हो चुके है ।लाला ग़ज़पति ने कहा मगर ये कैसे हो सकता है कि लाला गजपति अभी गांव में जिंदा है और गांव वाले उसकी शान में गुस्ताखी करे भाई पंडित महिमा तू ठहरा पंडित आदमी तोहे स्वर्ग नर्क वेद पुराण देवी देवता पाप पुण्य के भय सतावत बा लेकिन हम कायस्त मनई जिनगी के मौज में विश्वास करीत मरे पे का होई नही मतलब पंडित महिमा ने कहा लाला कौनो जुगत लगा जिससे हम दोनों की पूछ गांव में पहले जैसे हो जाय और फिर से हम लोगन के गांव में सल्तनत
कायम हो जाय लाला ग़ज़पति बोले पंडित धीरज रखो एक बात जानत हो पंडित बोले का लाला गजपति बोले जब भारत आजाद भवा ऊ समय दुई महत्वपूर्ण घटना हुई एक देशवा धरम की नाम पर दुई भाग में बंट गया और आजादी के साथ देशवा को दुई विरासत मिली एक देशवा का नाम बदल गवा भारत से हिंदुस्तान होई गावा दूसरा बटवारा सिद्धान्त मिल गया अब आजद मुल्क भारत के गांव गांव में आज नाही त कल इहे दुई आचरण घर घर गांव गांव में दिखे आज नाही त कल भले केतनो नया पौध नौजवान के आ जावे।हम मुल्क की आजादी की विरासत का इस्तेमाल समझो अपने गांव से शुरू करीत है ताकि आपन गांव देश के भविष्य के आदर्श गांव के नाम से जाना जाई पंडित महिमा बड़े आश्चर्य से बोले मान गए मित्र झूठे थोड़े कहा जात है कि लाला लहर से नोट छाप दे अब बताओ मित्र तोहरे दिमाग मे का चलत बा लाला ग़ज़पति बोले बुरबक पंडित अब तक नाही समझे आज़ादी के विरासत के प्रयोग गांव में होई मतलब गांव में जेतने जाती के टोला है उनके नाम वोही जाती के टोला के नाम से जाना जाय जैसे चम टोली बिन टोली
लाला टोला पंडित टोला ठाकूरान मिया टोली पंडित महिमा बोले ऐसे का होई ?लाला ग़ज़पति थोड़ा गुस्से में बोले पंडित जिनगी भर बकलोल रहिगे अरे पंडित यही तो भारत से आजाद हिंदुस्तान की विरासत है एक त वैल्लोर गांव न रहिजाय टोलन में बंटी जाय जैसे वोकर पहिचान जाति के टोलन से जुड़ी जाई पंडित आतुर होई के सवाल कियेन एके बाद का होइ लाला ग़ज़पति बोले पंडित हर टोला जाती में नेता पैदा होइयन और आपस मे हमेशा लडीहन कटिहन तबे त हमारे जईसन लोगन के राजनीति हनक कायम रही सकत पंडित महिमा बड़े गर्व से बोले मान गए मित्र कायस्त की खोपड़ी लाला ग़ज़पति बोले देखते जाओ मित्र मैं भारत से हन्दुस्तान की आजादी के विरासत की विसात पर क्या क्या करते है।पंडित महिमा दत्त को जो कांकल मानव खोपड़ी गाँव नदी में स्नान करके लौटते समय रेत में मिली थी उसको उन्होंने बढे जतन से सम्भाल कर अपने व्यक्तिगत कमरे में छुपा कर रख दिया था प्रतिदिन एक बार अवश्य कमरा खोल कर आस्वस्त होते की खोपड़ी सुरक्षित है कि नही ।एका एक दिन पंडित महिमा के सपने में ठाकुर सतपाल सिंह आये और बोले पंडित हमार मित्र ते हमरे खोपड़ी को काहे एतना जतन से रखे है पंडित जी बोले हमे का मालूम कि जो खोपड़ी हम नदी की रेता से उठा कर लाये है वो तुमरी खोपड़ी है ठाकुर सतपाल खीज कर बोले ससुर के नाती पण्डित जियत जी हमारे खोपड़ी के दम पर गांव में इतना उधम मचाये मरे के बाद उहि खोपड़ी को पहचानत तक नाही है पण्डित बोले बताओ मित्र हम तुम्हरी खोपड़ी को एतना जतन से रखे है अब का करि ठाकुर सतपाल बोले पंडित जियत जी तोके हम मित्रता के नाम पर ढोवत रहेन मरलो के बाद चैन नाही लेबे देत हौ पंडित बोले का करि मित्र तोहरे मित्रता खातिर ठाकुर सतपाल बोले सुन पंडित जब हम मरेंन हमारी आत्मा जमराज के दरबार मे पहुंची त ऊ कहिन ठाकुर तूने जिंदगी भर लोंगो को दुख पीड़ा क्लेश कलह जैसी व्यधि से परेशान किया है तो तुम्हे भयंकर सजा और नर्क मिलेगा चुकी धोखा मक्कारी और फरेब से लोगो को तबाह परेशान किया इसलिये तुम पहले सांप के रूप में जन्म लोगे और मैं तुरंत साँप के रूप में जन्म लेकर जब रेंगना शुरू किया तभी मेरी माँ मुझे निगलने के लिये झपटी मैं भाग कर अपनी पिछले जन्म की मानव खोपड़ी छिप गया जब तुम खोपड़ी के साथ मुझे उठा कर ले जा रहे थे तब तुम्हे डसने का मौका मिला मगर मैने तुम्हे पहचान लिया और तुमको छोड़ दिया मगर गांव के पंचायत सदस्यों की बैठक में पीपल के पेड़ पर बैठा पंचायत की कार्यवाही देख रहा था और मालूम हुआ कि यह मीटिंग मेरे ही स्मारक के लिए है और पंचायत सदस्य मेरा स्मारक सदबुद्धि यज्ञ की हवन कुंड के स्थान पर नही बनने देना चाह रहे है तो मैं जान बूझ कर मैं मुसई पर गिरा और डस लिया और गांव वालों ने मुझे मार डाला मरने के बाद मैं पुनः जमराज के दरबार पहुंचा तो जमराज ने कहा अब तुम्हे चूहे बनकर जन्म लेना होगा हमे लगा कि ई जमराज तो हमे जनम दर जनम परेशान करेगा तब मैंने जमराज के खिलाफ अकेले मोर्चा खोला और जमराज के सारे तंत्र को जमराज का ही शत्रु बना दिया अब जमराज को ही यमपूरी में शासन करना दुरूह हो चुका है हमने जमराज को फरमान दे रखा है सुन जमराज जब तक हमारे दो मित्र पंडित महिमा दत्त एव लाला ग़ज़पति यहां नही आ जाते तब तक तुम केयर टेकर यमपुरी के शासक बन व्यवस्था की देख रेख करो मेरे दोनों मित्रो के आने के बाद तुम पृथ्वी पर जाकर बिभिन्न शरीरों में भृमण करोगे और यम पूरी की शासन व्यवस्था हम तीनो मित्र संभालेंगे जम पूरी की संसद सांसद विधायक पार्षद मेरे प्रस्तव को दो तिहाई से सहमति प्रदान कर चुके है अब हम यहाँ यमपुरी में भावी शासक के तौर पर विशिष्ट अतिथी का शुख भोग रहे है और तुम्हारा और लाला ग़ज़पति के आने का इंतजार कर रहे है मगर इसमें एक पेंच फंस गया है पंडित महिमा दत्त बोले क्या मित्र ठाकुर सतपाल ने बताया कि जब तक मेरे किसी जन्म का अवशेष पृथ्वी लोक में है मुझे यम पूरी का पूर्ण स्वामित्व नही मिल सकता है अतः मेरी खोपड़ी के छोटे छोटे टुकड़े कर गांव की नदी में प्रवाहित कर दो इतना कह कर ठाकुर सतपाल अंतर्ध्यान हो गए पंडित महिमा की निद्रा की तंद्रा टूटी और उन्होंने निश्चय किया कि ठाकुर सतपाल की खोपडी अभी नदी में विसर्जित कर देंगे पंडित तुरंत ही अपने खुफिया व्यक्तित्व कमरे को खोला और खोपडी खोजने लगे मगर उनको ठाकुर सतपाल की खोपड़ी कही नही मिली ।पंडित महिमा दत्त को जब ठाकुर सतपाल सिंह की खोपड़ी सारे प्रयत्न के नही मिली तो खीज कर अपनी पत्नी पंडिताइन विमला पूछा कि मैंने अपने कमरे में एक मानव खोपडी रखी थी क्या तुमने देखा पंडिताइन बोली हाँ मैँ आज घर की सफाई कर रही थी मुझे ख्याल आया कि महीनों से तुमरे कमरे की सफाई नही की है उसकी साफ सफाई करनी चाहिये जब मैं सफाई कर रही थी तभी मैन देखा कि वहाँ एक मानव खोपड़ी रखी है पहले तो मुझे यही नही समझ मे आ रहा था कि तुमरे कमरे में ये मानव खोपड़ी आई तो कैसे क्योकि ई कमरा तो तुमरे अलावा कोई खोलत नाही फिर सोचा कि तुम तो सठियाई गए हो अनाप सनाप हरकत करत रहत हो ये तुमरी ही कारस्तानी है तुम्हें नही मालूम कि घर मे मुर्दा या हड्डी रखना अपशगुन होत है।तुम तो शेष नाग की फुंकार की तरह फुंकार मारीक़े सोई रहे थे हमने डाँगी डोम को पूरे बीस रुपये दिया तब जाकर उसने खोपड़ी के छोटे छोटे टुकड़े करके गांव की नदी में विसर्जित कर दिया पता नही किसकी खोपड़ी थी बेचारे की आत्मा भटक रही होय अब कम से कम स्वर्ग चाहे नरक में वोका कौनो जगह तो मील जाई पंडित महिमा दत्त प्रफुल्लित हो बोले शाबाश पंडिताइन आज जिनगी में नीक काम किये हऊ पंडताईंन बोली ऊ सब त ठीक है मगर ई खुराफात तोहरे दिमाग मे कहाँ से आई गइल की जाने केकर खोपड़ी उठाई लाये और इहो ना समझे कि घर मे मुर्दा क हड्डी रखे अशुभ होत है पंडित तू पगला त पहिले गई रहे अब सठियाई गइल हवो
पंडित जी ने पंडताईंन का कोई जबाब ना देकर पंडिताइन को चुप रहने को विवस कर दिया।पंडित महिमा दत्त के पेट मे खलबली मची हुई थी वे जल्द से जल्द ठाकुर सतपाल सिंह से सपने की मुलाकात और खोपडी के साथ सांप के रहस्य को लाला ग़ज़पति से साझा करना चाहते थे फटाफट पंडित तैयार होकर लाला ग़ज़पति से मिलने के लिये चलने को हुए पंडताईंन ने उन्हें जल जलपान के लिये रोकना चाहा मगर पंडित ने पंडताईंन की एक भी बात नही सुनी और घर से निकल पड़े तुरंत ही वह लाला ग़ज़पति के घर पहुंच गए लाला ग़ज़पति उनको देखकर आश्चर्य से सवाल दाग दिया बोले का पंडित तू रात भर सोए नाही पंडित बोले लाला झट से कुछ जल जलपान कराव स्थिर होई जात हई त तबशील से सारा किस्सा बतावत हई लाला जी स्वयं घर के अंदर गए और जोरदार जलपान की व्यवस्था साथ लेकर आये लाला जी खाने पीने के शौकीन थे पंडित जी ने जलपान शुरू करने से पहले कहा लाला आज लगत ह की हमहू मनई हई एतना बढ़िया जलपान त हम छठे छ मासे करीत है लाला अभिमान से अहल्लादित होकर बोले पंडित जी तोहरे यहाँ त दही चुड़ा और पूड़ी सब्जी वियाह भोज यज्ञ पारोज में चलत ह तू का जान खाय पिये के शौक चल जलपान पाव और बताव की का बाती रही कि तू भागे भागे सुबहे फाटि परे पंडित जी जलपान का निवाला घोटते हुए रात अपने सपने में
ठाकुर सतपाल से मुलाकात की बात बताई और नदी से नहा के लौटते समय खोपडी और सांप का पूरा किस्सा बताया लाला पंडित की सारी बात सुनने के बाद बोले पंडित लागत है तोहरी दिमागी हालत ठीक नाही है आरे ठाकुर जियत जी कबो कही जात रहा सारा खुराफात हम लोगन के बुलाई के शामिल बाज़ा की तरह बजावत रहा मरे के बाद पड़ा होई कही सपनो में आवे खातिर कुछ मेहनत करे क पड़ी उ त खुराफात क पकापकया माल बैठे खाय का आदि रहा तू नाही जनत हमने के साथी रहा
पंडित बोले लाला विश्वाश करो हम सही बोल रहे है लाला बोले अब पंडित सही बोल या गलत हमे विश्वाश नाही है पंडित बोले भाई गजपति एक दिन तुहु ई सच्चाई के मान जॉब और सुन लाला ठाकुर सतपाल यमराज की सत्ता के चुनौती दिए हन उहा के सारे कारिंदा सांसद विधायक पार्षद के आपने पक्ष में करिके जमराज के अकेला औकात बताई दिए हैं लाला पंडित की बात गौर से सुनने के बाद झट से पंडित की नाड़ी पकड़े बोले पंडित वैसे त तोहार तबियत खराब नाही दिखत बा फिर भी तोहे इलाज की जरूरत बा चाहे तू सठियाई गए हो अनाप सनाप बक़े जाई रहा हौ पंडित बोले लाला तू जौन चाहे बक मगर सच्चाई ईए है लाला ग़ज़पति ने कहा माना ठाकुर सतपाल की खुराफाती खोपडी के लोहा गांव भर मानत रहा और ऊके सिक्का हम लोग चलावत रहे मगर जमपुरी में उनकर औकात कौनो नरक के कीड़ा मकोड़ा के होई
पंडित महिमा दत्त बोले लाला मान चाहे ना मान एक दिन सच्चाई समझ जाब। लाला गजपति बोले छोड़ पंडित ई सब बवाल अब गाँव मे कईसे हम दुनो मनई राज करि ए पर विचार करो पंडित ने मशवरा झट लाला ग़ज़पति को दिया बोले पूरे गांव के टोलो को जो पहले से जाति के आधार पर बांट दिया है उनको सिर्फ एहसास करके उनमें एक एक नौजवान नेता रूरल बैरिस्टर पैदा कर देते है फिर क्या हम लोग गांव के बादशाह और बादशाहत कायम।।लाला को पंडित का यह सुझाव सटीक लगा और उस पर अमल की कार्य योजना बनाकर रण नीति कार्य योजना पर विचार विमर्श के बाद पंडित अपने घर चले गए और लाला अपने खुराफात की रणनीति में मशगूल हो गए।दिन बीतने के बाद लाला ग़ज़पति रात्री को खाना खा कर सोने लगे जब लाला ग़ज़पति गहरी नींद में सोए हुए थे कि नीद में एकाएक ठाकुर सतपाल अवतरित होकर बोले लाला ग़ज़पति पंडित महिमा तोहरे पास सपने में हमारी मुलाकात की बात कहेन तू भरोसा काहे नाही किये वैसे तो जिंदा रहित जितना झूठ फरेब कहत करत बोलित तीनो मित्र केहू केहू पर सवाल खड़ा नाही करत मगर आज काहे ना विश्वास कीहै लाला ग़ज़पति बोले हम भूत प्रेत में विश्वास नाही करीत ठाकुर सतपाल बोले सुनो लाला हम भूत उत नाही है हम त भूत बनावे वाला यमराज के भूत बनावे वाला हई तू और पंडित जब उहा से शरीर छोड़ कर आईब तब यमपुरी की शासन व्यवस्था हम तीनों के हाथ मे रही और यमराज जएहन जमीन पर जमराज के भूत बनके त लाला ग़ज़पति जल्दी से मिशन वैल्लोर पूरा करके यहां आओ यमपुरी की सत्ता संभालनी है और सुनो लाला तू चित्र गुप्त और जमराज पंडित यमपुरी की न्याय व्यवस्था सम्भालेंगे न्याय के मुख्य दंडा अधिकरी होंगे और मैं स्वय यमराज की भूमिका निभाउंगा देखो भाई लाला गज़पति हमने यमपुरी की सत्ता हथियाने के लिये यमपुरी में यमराज से अकेले लोहा लिया और सल्तनत कायम की है तुमको पोर्टफोलियो और पद को लेकर कोई संसय हो तो बताओ लाला गजपति बोले नही ठाकुर सतपाल यहाँ भी जीते जी तुमने हमे और पंडित के लिये सत्ता सुख सोमारू को माध्यम बनाकर सौंपी थी और मरने के बाद भी तुमने दोस्ती का ख़याल रखा हमे ठाकुर सतपाल का हर फैसला स्वीकार है ।तब ठाकुर सतपाल बोले लाला अब जल्दी से तुम और पंडित मिलकर गाँव बिल्लोर में हमेशा के लिये हम लोंगो की विचार धरा की स्थाई सत्ता की मुस्तकिल बुनियाद बनाकर यहाँ आओ और हम यहॉ की सत्ता से सम्पूर्ण संसार पर शासन की बागडोर संभाले इतना कह कर ठाकुर सतपाल अंतर्ध्यान हो गए लाला गजपति की नीद खुली सुबह हो चुकी थी लाला गजपति को सुबह नई उर्जा दे रही थी उठकर वे पंडित महिमा का इंतज़ार करने लगे कुछ ही देर सूरज चढ़ने पर पंडित महिमा लाला गजपति के सामने हाज़िर थे उनको देखते ही लाला बोल उठे पंडित तू सही कहत रहे राती के ठाकुर सतपाल हमरे सपने में भी आयन और सारी बात बताएंन उनकर इच्छा है की हम दुइनो मिलके विल्लोर में अपनी सिद्धान्त की सत्ता जल्दी से मुस्तकिल कर देई अब समय कम है हमे तोहे साथ चलीके जमपुरी में उहोके सत्ता ठाकुर सतपाल के साथ सभालेके बा अब जेतना जल्दी हो सके ईहां के काम पूरा किया जाय पंडित महिमा दत्त ने कहा देखा मित्रता ठाकुर सतपाल दोस्ती के मिशाल कायम किहेन ठाकुर सतपाल की जय जय जय ।।

नांदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर

Last Updated on February 9, 2021 by nandlalmanitripathi

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